दिल्ली हाईकोर्ट 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रंका की उस याचिका पर आज सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया, जिसमें उन्होंने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसके तहत उनकी न्यायिक हिरासत को दो और दिनों के लिए बढ़ा दिया गया।

इस मामले को आज (बुधवार) तत्काल सुनवाई के लिए रखा गया, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। यह मामला जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद की बेंच के सामने सूचीबद्ध किया गया।

इस बीच, दास और रंका को SEM कोर्ट के सामने पेश किया जाएगा, क्योंकि उनकी दो दिन की न्यायिक हिरासत आज खत्म हो रही है।

यह मामला उनके द्वारा पहले भरे गए 'पीस बॉन्ड' (शांति बनाए रखने के बॉन्ड) के कथित उल्लंघन से जुड़ा है। आरोप है कि उन्होंने निषेधाज्ञा (Prohibitory Orders) का उल्लंघन करते हुए जंतर-मंतर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की कोशिश की थी।

इससे पहले, 14 अक्टूबर को एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट महेश कुमार मीना ने इन दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। आगे की कार्यवाही के लिए यह मामला 19 अक्टूबर को सूचीबद्ध किया गया, जिस दिन याचिकाकर्ताओं की न्यायिक हिरासत दो दिन और बढ़ा दी गई।

याचिका में कहा गया कि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) ने BNSS की धारा 135(3) के तहत न्यायिक हिरासत बढ़ाने की अपनी शक्तियों का "मनमाना इस्तेमाल" किया। याचिका के अनुसार, न्यायिक हिरासत का आधार "बॉन्ड न भर पाना" (default of execution of the Bond) बताया गया, लेकिन यह आधार गलत है, क्योंकि 19 अक्टूबर को याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश की गई ज़मानत (Sureties) कानून के अनुसार ही थीं।

याचिका में यह भी कहा गया कि SEM का यह निष्कर्ष कि "कोई अन्य ज़मानतदार मौजूद नहीं था", प्रथम दृष्टया गलत है, क्योंकि याचिकाकर्ताओं के पास दो और ज़मानतदार मौजूद थे। इसके अलावा, दो और ज़मानतदार भी तैयार थे, जिनके पास विधिवत भरे हुए बॉन्ड और FDR मौजूद थे, लेकिन उन्हें पेश करने का कोई मौका ही नहीं दिया गया।

याचिका में आगे कहा गया कि SEM के आदेश में दी गई हर बात जांच अधिकारी (Investigating Officer) की अर्जी से ली गई। इसमें कहा गया कि किसी 'डी-नोटिफाइड' (de-notified) जगह पर विरोध प्रदर्शन करना केवल नियमों और रेगुलेशन का सवाल है, न कि सार्वजनिक व्यवस्था (public order) के लिए कोई खतरा। इससे पहले, 10 अक्टूबर को उन्हें एक हवाई अड्डे पर हिरासत में लिया गया। दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ घोषित विरोध प्रदर्शनों से पहले, उन पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 170 के तहत निवारक कार्रवाई की गई।

उसी दिन उनसे 50,000 रुपये का 'शांति बॉन्ड' (पीस बॉन्ड) भरवाकर उन्हें छोड़ दिया गया। हालांकि, 14 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर 'तिरंगा विरोध प्रदर्शन' करने की कोशिश करने के बाद उन्हें फिर से हिरासत में ले लिया गया।

19 अक्टूबर के अपने आदेश में विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ऋतु राज ने उनकी न्यायिक हिरासत बढ़ाते हुए कहा कि प्रतिवादियों ने जानबूझकर अपने बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया और तुरंत शांति भंग की।

अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी द्वारा पेश किए गए हिरासत के आधार प्रतिवादियों के उस कथित आदतन व्यवहार की ओर इशारा करते हैं, जिसके तहत वे प्रतिबंधित (डी-नोटिफाइड) क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन आयोजित करते हैं। अदालत ने आगे कहा कि पुलिस द्वारा रिकॉर्ड पर रखे गए सबूतों को देखते हुए प्रतिवादियों का यह भरोसा दिलाना कि वे ऐसा दोबारा नहीं करेंगे, विश्वास जगाने के लिए काफी नहीं है।

अदालत ने प्रतिवादियों को नई जमानत (श्योरिटी) पेश करने का भी निर्देश दिया, क्योंकि उनके द्वारा पेश की गई जमानतें स्वीकार करने योग्य नहीं थीं। आदेश में बताया गया कि बॉन्ड दस्तावेजों पर लगी तस्वीरों और जमानत देने वालों के आधार कार्ड में विसंगतियां थीं। इसके अलावा, पूछताछ के दौरान वे संतोषजनक जवाब देने में भी असमर्थ रहे।

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