दिल्ली रेस क्लब को झटका, पब्लिक प्रिमाइसेस कानून के तहत कार्रवाई पर हाईकोर्ट ने हटाई रोक
दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली रेस क्लब को बड़ा झटका देते हुए केंद्र सरकार की अपील मंजूर की। अदालत ने एकलपीठ के उस अंतरिम आदेश को रद्द किया, जिसमें एस्टेट ऑफिसर के समक्ष चल रही कार्रवाई पर रोक लगाई गई थी।
चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया। मामला पब्लिक प्रिमाइसेस (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम के तहत दिल्ली रेस क्लब को जारी कारण बताओ नोटिस से जुड़ा है।
केंद्र सरकार का कहना है कि दिल्ली रेस क्लब की लीज समाप्त हो चुकी है और उसके बाद कोई विस्तार नहीं दिया गया। ऐसे में क्लब का परिसर पर कब्जा अनधिकृत है।
दरअसल, केंद्र सरकार ने 17 अप्रैल 2026 को क्लब को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। इसके खिलाफ क्लब ने हाईकोर्ट की एकलपीठ का दरवाजा खटखटाया था। एकलपीठ ने 24 अप्रैल 2026 को एस्टेट ऑफिसर के समक्ष आगे की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी।
इस आदेश को केंद्र सरकार ने खंडपीठ में चुनौती दी। केंद्र की ओर से दलील दी गई कि याचिका केवल कारण बताओ नोटिस के खिलाफ दायर की गई थी जबकि कानून में पूरा वैधानिक तंत्र उपलब्ध है।
सरकार ने कहा कि पहले एस्टेट ऑफिसर मामले की सुनवाई करेगा और उसके बाद अधिनियम की धारा 9 के तहत अपील का भी प्रावधान है। ऐसे में शुरुआती चरण में ही अदालत से हस्तक्षेप की मांग उचित नहीं थी।
केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि दिल्ली रेस क्लब जिस जमीन पर कब्जा किए हुए है, वह लोक कल्याण मार्ग स्थित करीब 53.242 एकड़ की बहुमूल्य सार्वजनिक भूमि है। यह जमीन भारत सरकार के आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय के भूमि एवं विकास कार्यालय के अधीन है।
सरकार के अनुसार क्लब 8 मार्च 1926 की लीज डीड के आधार पर अधिकार का दावा कर रहा है। हालांकि यह स्थायी लीज नहीं थी बल्कि सीमित अवधि के लिए दी गई थी। सरकार का कहना है कि अंतिम विस्तार 31 दिसंबर 1994 को समाप्त हो गया था और उसके बाद कोई नवीनीकरण नहीं हुआ।
केंद्र ने अदालत को बताया कि क्लब लगातार यह दावा कर रहा है कि उसकी लीज अब भी प्रभावी है, जबकि सरकार इस दावे को पूरी तरह खारिज करती है। सरकार के मुताबिक, लीज की वैधता, कब्जे की स्थिति और अधिकार से जुड़े सभी विवाद ऐसे मुद्दे हैं जिनका फैसला सबसे पहले एस्टेट ऑफिसर को करना चाहिए।
खंडपीठ ने केंद्र सरकार की दलीलों से सहमति जताते हुए एकलपीठ द्वारा लगाई गई रोक हटा दी और एस्टेट ऑफिसर के समक्ष कार्रवाई जारी रखने का रास्ता साफ कर दिया।