रजिस्टर्ड दस्तावेज़ से प्राप्त संपत्ति का स्वामित्व मौखिक पारिवारिक समझौते के दावों पर प्रभावी रहेगा: दिल्ली हाइकोर्ट

Update: 2026-01-13 11:02 GMT

दिल्ली हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी संपत्ति के संबंध में यदि स्वामित्व रिजस्टर्ड विक्रय/हस्तांतरण डीड के आधार पर स्थापित है तो उसे केवल अस्पष्ट या अप्रमाणित मौखिक पारिवारिक समझौते के दावों के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती। हाइकोर्ट ने कहा कि ऐसे मौखिक दावे जब तक ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से समर्थित न हों रजिस्टर्ड टाइटल को परास्त नहीं कर सकते।

जस्टिस अनिल क्षेतरपाल और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने व्यक्ति द्वारा दायर अपीलों को खारिज किया, जिसमें उसने आवासीय संपत्ति पर संयुक्त स्वामित्व का दावा कथित पारिवारिक व्यवस्था के आधार पर किया था। अदालत ने उसके भाई के पक्ष में पारित डिक्री बरकरार रखी, जिसके नाम पर संपत्ति का रजिस्टर्ड हस्तांतरण विलेख मौजूद था।

हाइकोर्ट ने कहा कि केवल यह कह देना कि संपत्ति संयुक्त पारिवारिक धन से खरीदी गई तब तक कोई महत्व नहीं रखता जब तक उसे समकालीन दस्तावेज़ी साक्ष्यों से सिद्ध न किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कोई ट्रांसफर डीड विधिवत निष्पादित और रजिस्टर्ड होकर केवल वादी के नाम पर है तो उसके पक्ष में वैध स्वामित्व, कानूनी अधिकार और विशेष रूप से वित्तीय योगदान की एक मजबूत विधिक धारणा उत्पन्न होती है। ऐसी स्थिति में मात्र इनकार या अनुमान आधारित आरोप उस धारणा को खंडित करने के लिए पर्याप्त नहीं होते।

मामले का विवाद 1990 के दशक में खरीदी गई एक संपत्ति से जुड़ा था। अपीलकर्ता का कहना था कि यद्यपि संपत्ति का टाइटल उसके भाई के नाम पर है, लेकिन वास्तव में वह संयुक्त परिवार के लाभ के लिए खरीदी गई और एक मौखिक पारिवारिक समझौते द्वारा शासित थी। उसने बेनामी लेन-देन निषेध कानून के तहत न्यासी/विश्वासपात्र क्षमता (फिड्युशियरी कैपेसिटी) के अपवाद का भी सहारा लेने की कोशिश की।

हाइकोर्ट ने इन दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि कथित पारिवारिक समझौते के अस्तित्व, उसकी शर्तों या उसके क्रियान्वयन को सिद्ध करने के लिए कोई भी ठोस दस्तावेज़ी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने दोहराया कि यद्यपि पारिवारिक समझौता मौखिक भी हो सकता है, लेकिन उसका अस्तित्व तभी माना जा सकता है, जब स्पष्ट, भरोसेमंद और ठोस साक्ष्य हों जिनसे यह साबित हो कि पक्षकारों के बीच वास्तविक सहमति थी और उस पर अमल भी किया गया। वर्तमान मामले में प्रतिवादी इस कसौटी पर पूरी तरह असफल रहे।

बेनामी कानून के संदर्भ में अदालत ने कहा कि केवल यह आरोप लगा देना कि पक्षकारों के बीच कोई विश्वासपात्र या न्यासी संबंध था, पर्याप्त नहीं है। ऐसे अपवाद का लाभ लेने के लिए स्पष्ट दलीलें और ठोस प्रमाण आवश्यक होते हैं। अदालत ने कहा कि केवल औपचारिक रूप से “फिड्युशियरी क्षमता” का उल्लेख करके बेनामी कानून के प्रतिबंधों से नहीं बचा जा सकता, क्योंकि ऐसा करना कानून के उद्देश्य और विधायी मंशा को ही निष्फल कर देगा।

मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए हाइकोर्ट ने यह भी पाया कि अपीलकर्ता का संपत्ति में निवास अनुमति के आधार पर था। इस प्रकार का अनुमति-आधारित कब्जा कभी भी स्वामित्व या प्रतिकूल कब्जे के अधिकार में परिवर्तित नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि एक लाइसेंसी हमेशा लाइसेंसी ही माना जाएगा और लाइसेंस के रहते या उसके निरस्त होने के बाद संपत्ति की वापसी के लिए दायर वाद में वह स्वयं के या किसी अन्य के पक्ष में स्वामित्व का दावा नहीं कर सकता।

इन सभी कारणों से हाइकोर्ट ने अपीलों को खारिज कर दिया और रजिस्टर्ड दस्तावेज़ से प्राप्त संपत्ति का स्वामित्व मौखिक पारिवारिक समझौते के दावों पर प्रभावी रहेगा: दिल्ली हाइकोर्ट

दिल्ली हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी संपत्ति के संबंध में यदि स्वामित्व रिजस्टर्ड विक्रय/हस्तांतरण डीड के आधार पर स्थापित है तो उसे केवल अस्पष्ट या अप्रमाणित मौखिक पारिवारिक समझौते के दावों के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती। हाइकोर्ट ने कहा कि ऐसे मौखिक दावे जब तक ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से समर्थित न हों रजिस्टर्ड टाइटल को परास्त नहीं कर सकते।

जस्टिस अनिल क्षेतरपाल और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने व्यक्ति द्वारा दायर अपीलों को खारिज किया, जिसमें उसने आवासीय संपत्ति पर संयुक्त स्वामित्व का दावा कथित पारिवारिक व्यवस्था के आधार पर किया था। अदालत ने उसके भाई के पक्ष में पारित डिक्री बरकरार रखी, जिसके नाम पर संपत्ति का रजिस्टर्ड हस्तांतरण विलेख मौजूद था।

हाइकोर्ट ने कहा कि केवल यह कह देना कि संपत्ति संयुक्त पारिवारिक धन से खरीदी गई तब तक कोई महत्व नहीं रखता जब तक उसे समकालीन दस्तावेज़ी साक्ष्यों से सिद्ध न किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कोई ट्रांसफर डीड विधिवत निष्पादित और रजिस्टर्ड होकर केवल वादी के नाम पर है तो उसके पक्ष में वैध स्वामित्व, कानूनी अधिकार और विशेष रूप से वित्तीय योगदान की एक मजबूत विधिक धारणा उत्पन्न होती है। ऐसी स्थिति में मात्र इनकार या अनुमान आधारित आरोप उस धारणा को खंडित करने के लिए पर्याप्त नहीं होते।

मामले का विवाद 1990 के दशक में खरीदी गई एक संपत्ति से जुड़ा था। अपीलकर्ता का कहना था कि यद्यपि संपत्ति का टाइटल उसके भाई के नाम पर है, लेकिन वास्तव में वह संयुक्त परिवार के लाभ के लिए खरीदी गई और एक मौखिक पारिवारिक समझौते द्वारा शासित थी। उसने बेनामी लेन-देन निषेध कानून के तहत न्यासी/विश्वासपात्र क्षमता (फिड्युशियरी कैपेसिटी) के अपवाद का भी सहारा लेने की कोशिश की।

हाइकोर्ट ने इन दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि कथित पारिवारिक समझौते के अस्तित्व, उसकी शर्तों या उसके क्रियान्वयन को सिद्ध करने के लिए कोई भी ठोस दस्तावेज़ी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने दोहराया कि यद्यपि पारिवारिक समझौता मौखिक भी हो सकता है, लेकिन उसका अस्तित्व तभी माना जा सकता है, जब स्पष्ट, भरोसेमंद और ठोस साक्ष्य हों जिनसे यह साबित हो कि पक्षकारों के बीच वास्तविक सहमति थी और उस पर अमल भी किया गया। वर्तमान मामले में प्रतिवादी इस कसौटी पर पूरी तरह असफल रहे।

बेनामी कानून के संदर्भ में अदालत ने कहा कि केवल यह आरोप लगा देना कि पक्षकारों के बीच कोई विश्वासपात्र या न्यासी संबंध था, पर्याप्त नहीं है। ऐसे अपवाद का लाभ लेने के लिए स्पष्ट दलीलें और ठोस प्रमाण आवश्यक होते हैं। अदालत ने कहा कि केवल औपचारिक रूप से “फिड्युशियरी क्षमता” का उल्लेख करके बेनामी कानून के प्रतिबंधों से नहीं बचा जा सकता, क्योंकि ऐसा करना कानून के उद्देश्य और विधायी मंशा को ही निष्फल कर देगा।

मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए हाइकोर्ट ने यह भी पाया कि अपीलकर्ता का संपत्ति में निवास अनुमति के आधार पर था। इस प्रकार का अनुमति-आधारित कब्जा कभी भी स्वामित्व या प्रतिकूल कब्जे के अधिकार में परिवर्तित नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि एक लाइसेंसी हमेशा लाइसेंसी ही माना जाएगा और लाइसेंस के रहते या उसके निरस्त होने के बाद संपत्ति की वापसी के लिए दायर वाद में वह स्वयं के या किसी अन्य के पक्ष में स्वामित्व का दावा नहीं कर सकता।

इन सभी कारणों से हाइकोर्ट ने अपीलों को खारिज कर दिया और रजिस्टर्ड दस्तावेज़ के आधार पर स्थापित स्वामित्व को वैध और निर्णायक माना।

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