निजी स्कूलों में पीटीए का गठन और संचालन सुनिश्चित करे दिल्ली सरकार: दिल्ली हाइकोर्ट

Update: 2026-01-15 06:52 GMT

दिल्ली हाइकोर्ट ने बुधवार को दिल्ली सरकार से कहा कि वह राष्ट्रीय राजधानी के गैर-अनुदानित निजी स्कूलों में अभिभावक-शिक्षक संघ (PTA) का गठन और उनका प्रभावी संचालन सुनिश्चित करे।

हाइकोर्ट ने यह निर्देश एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।

चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने एनजीओ जस्टिस फॉर ऑल द्वारा दायर जनहित याचिका पर नोटिस जारी करते हुए दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय से जवाब मांगा है।

अदालत ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह रिकॉर्ड पर यह बताए कि निजी स्कूलों में विधिवत पीटीए के गठन और संचालन को सुनिश्चित करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए।

अदालत ने यह भी कहा कि अंतरिम अवधि में भी यह सुनिश्चित किया जाए कि सभी स्कूलों में पीटीए का गठन हो और वे सक्रिय रूप से कार्य करें।

याचिका में कहा गया है कि दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम 1973 के तहत पीटीए का गठन अनिवार्य है और इसका उद्देश्य पीटीए की कार्यकारिणी समिति के लिए नियमित, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना है।

पीटीए एक वैधानिक संस्था है जो अभिभावकों और शिक्षकों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्कूलों के प्रशासन और जवाबदेही व्यवस्था का एक अहम हिस्सा है।

याचिका में आरोप लगाया गया कि स्पष्ट वैधानिक प्रावधानों के बावजूद बड़ी संख्या में निजी स्कूल या तो पीटीए का गठन ही नहीं कर रहे हैं या फिर चुनिंदा लोगों को शामिल कर दिखावटी पीटीए बना रहे हैं।

इससे पीटीए का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है और अभिभावकों को अपनी समस्याएं उठाने का कोई प्रभावी मंच नहीं मिल पाता।

याचिका के अनुसार ऐसी स्थिति में अभिभावक अत्यधिक फीस वृद्धि जैसे मुद्दों को चुनौती देने के अपने वैधानिक अधिकार से भी वंचित हो रहे हैं।

'जस्टिस फॉर ऑल' ने यह भी कहा कि दिल्ली सरकार अपने वैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफल रही है।

सरकार की कथित निष्क्रियता के कारण निजी स्कूल बिना किसी जवाबदेही के काम कर रहे हैं जिससे कानून का शासन कमजोर हुआ है और दिल्ली में लाखों छात्रों व उनके अभिभावकों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।

याचिका में यह भी बताया गया कि इस मुद्दे को लेकर शिक्षा निदेशालय के समक्ष प्रतिनिधित्व किया गया लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने के कारण याचिकाकर्ता को हाइकोर्ट का रुख करना पड़ा।

अब इस मामले में हाइकोर्ट ने दिल्ली सरकार से जवाब मांगते हुए आगे की सुनवाई के लिए कदम उठाए।

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