छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 12 अलग-अलग क्षेत्रों में काम करती हैं और दोनों का उद्देश्य भी अलग है। इसलिए धारा 498ए के मामले में बरी हो जाने मात्र से महिला को घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत शिकायत दाखिल करने से नहीं रोका जा सकता।

जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास ने यह टिप्पणी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिका में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के समक्ष घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत दर्ज शिकायत को चुनौती दी गई।

शिकायत में आरोप लगाया गया कि पति अपनी पत्नी की देखभाल नहीं कर रहा था और एक लाख रुपये तथा मोटरसाइकिल की मांग को लेकर उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहा था।

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि इन्हीं आरोपों को लेकर शिकायतकर्ता पहले IPC की धारा 498ए के तहत FIR दर्ज करा चुकी थी। उस मामले में आरोपी बरी हो चुके हैं। यह भी बताया गया कि पति-पत्नी के बीच तलाक हो चुका है और बच्चे की अभिरक्षा को लेकर याचिका हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष लंबित है।

इन्हीं आधारों पर याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उसी घटनाक्रम के आधार पर घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत बाद में शिकायत दर्ज करना और अदालत की ओर से नोटिस जारी करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। उन्होंने शिकायत को रद्द करने की मांग की।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील यह है कि चूंकि उन्हें उन्हीं आरोपों से जुड़े धारा 498ए के मामले में पहले ही बरी किया जा चुका है, इसलिए घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत बाद में दाखिल की गई शिकायत अपने आप में गैरकानूनी है।

कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। उसने कहा कि धारा 498ए और घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 अलग-अलग क्षेत्र में काम करती हैं और दोनों के उद्देश्य भी अलग हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम बनाते समय संसद का उद्देश्य परिवार के भीतर या उससे जुड़े मामलों में किसी भी तरह की हिंसा की शिकार महिलाओं को संविधान के तहत मिले अधिकारों की अधिक प्रभावी सुरक्षा उपलब्ध कराना था।

कोर्ट ने घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 36 का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार इस कानून के प्रावधान उस समय लागू किसी अन्य कानून के अतिरिक्त हैं और किसी अन्य कानून के प्रावधानों को समाप्त नहीं करते।

हाईकोर्ट ने कहा,

"दोनों कानून अलग-अलग क्षेत्र में काम करते हैं। इसलिए IPC की धारा 498ए के तहत बरी होने से शिकायतकर्ता को 2005 के अधिनियम की धारा 12 के तहत शिकायत दाखिल करने से रोका या प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।"

कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत दर्ज शिकायत को अवैध नहीं माना जा सकता कि उसी घटनाक्रम से जुड़े आपराधिक मामले में आरोपी पहले बरी हो चुके हैं।

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत शिकायत पर संज्ञान लेकर कोई कानूनी गलती नहीं की।

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