बेटे का सीनियर सिटीजन होना 93 वर्षीय मां के घर पर कब्जे का अधिकार नहीं देता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का स्वयं सीनियर सिटीजन होना उसे किसी अन्य सीनियर सिटीजन की इच्छा के विरुद्ध उसके घर में रहने का असीमित अधिकार नहीं देता। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता और सीनियर सिटीजन के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 का उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों को उपेक्षा, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न से सुरक्षा देना है।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सिंगल बेंच के आदेश को चुनौती देने वाली अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। सिंगल बेंच ने भरण-पोषण अधिकरण और अपीलीय अधिकरण के उन आदेशों को बरकरार रखा, जिनमें अपीलकर्ताओं को आवासीय परिसर खाली करने का निर्देश दिया गया।
मामला एक 93 वर्षीय महिला की शिकायत से जुड़ा था। महिला ने आरोप लगाया कि उसके साथ घर में रहने वाले लोग उसे परेशान और प्रताड़ित कर रहे हैं तथा उसे अपनी जान का खतरा है। इसके बाद भरण-पोषण अधिकरण ने संबंधित लोगों को घर से बाहर करने का आदेश दिया।
अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि संपत्ति पर उनका स्वतंत्र अधिकार है। उन्होंने पंजीकृत सेल डीड के आधार पर संपत्ति पर अपना मालिकाना हक होने का दावा किया। उनका कहना था कि संपत्ति के स्वामित्व और कब्जे से जुड़े जटिल विवादों का फैसला भरण-पोषण अधिकरण संक्षिप्त कार्यवाही में नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने माना कि भरण-पोषण अधिकरण दीवानी अदालत का विकल्प नहीं है और संपत्ति के जटिल स्वामित्व संबंधी सवालों का अंतिम निर्णय उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि केवल स्वतंत्र स्वामित्व का दावा कर देने से अधिकरण के समक्ष चल रही कार्यवाही स्वतः समाप्त नहीं हो जाती।
पीठ ने कहा कि अधिकरण ने संपत्ति के स्वामित्व की घोषणा नहीं की थी, बल्कि 93 वर्षीय महिला को कथित उत्पीड़न से सुरक्षा देने के लिए घर खाली कराने का आदेश दिया था।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून में इस्तेमाल किए गए भरण-पोषण और कल्याण शब्दों की व्याख्या केवल मासिक आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं की जा सकती। कोई सीनियर सिटीजन आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बावजूद उपेक्षा, उत्पीड़न या अपने शांतिपूर्ण आवास में हस्तक्षेप का शिकार हो सकता है।
पीठ ने कहा कि संपत्ति के नामांतरण या स्वामित्व से जुड़े मामले लंबित होने से अधिकरण की सुरक्षात्मक शक्ति पूरी तरह खत्म नहीं हो जाती। संपत्ति का अंतिम स्वामित्व सक्षम दीवानी या राजस्व अदालत तय कर सकती है लेकिन ऐसा विवाद अधिकरण को बुजुर्ग सीनियर सिटीजन की सुरक्षा के लिए कानून के तहत कार्रवाई करने से नहीं रोक सकता।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि अपीलकर्ताओं का स्वयं सीनियर सिटीजन होना उन्हें 93 वर्षीय महिला की इच्छा के विरुद्ध घर में बने रहने का कोई सर्वोच्च या अटल अधिकार नहीं देता।
पीठ ने कहा कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर अधिकरण और एकल पीठ द्वारा निकाला गया निष्कर्ष कानून के विपरीत या मनमाना नहीं था। केवल इसलिए उस निष्कर्ष में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता कि उपलब्ध सामग्री की कोई दूसरी व्याख्या भी संभव हो सकती है।
हाईकोर्ट ने एकल पीठ के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि, अधिकार क्षेत्र संबंधी कमी या स्पष्ट विकृति नहीं पाते हुए अपील खारिज की।