एनडीपीएस केस : सिद्ध करने के प्रतिलोम भार का नियम अभियोजन पक्ष को आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया केस साबित करने से विमुक्त नहीं करता, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फैसला

Update: 2019-09-01 08:55 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रापिक सब्सटेंसेस एक्ट (NDPS)में आरोपी पर खुद को निर्दोष साबित करने के प्रतिलोम भार का नियम है, परंतु यह अभियोजन पक्ष को आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया केस साबित करने से विमुक्त नहीं करता है।

जस्टिस नवीन सिन्हा और जस्टिस इंद्रा बनर्जी की पीठ इस मामले में एक आरोपी की अपील पर सुनवाई कर रही थी। इस मामले में आरोपी को एनडीपीएस एक्ट की धारा 8 व धारा 18(बी) के तहत दस साल के कारावास व एक लाख रुपए जुर्माने की सजा दी गई थी।

आरोपी की तरफ से दी गई विभिन्न दलीलों पर विचार करने के बाद पीठ ने हनीफ खान उर्फ अन्नु खान बनाम सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नारकोटिक्स के मामले में टिप्पणी की :

"एनडीपीएस एक्ट के मामले में अभियोजन पक्ष पर उल्टा यह साबित करने का भार होता है कि आरोपी की आपराधिक मानसिक स्थिति थी। आरोपी के पास से मादक पदार्थ मिलते ही उसे दोषी मान लिया जाता है। वहीं यह आरोपी पर भार होता है कि वह खुद को निर्दोष साबित करे। जबकि आपराधिक न्यायशास्त्र के सामान्य नियम के अनुसार एक आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक कि वह दोषी साबित न हो जाए।

परंतु इसके बाद भी अभियोजन पक्ष को आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया केस साबित करने से छूट नहीं मिलती है क्योंकि उसी के बाद आरोपी पर खुद को निर्दोष साबित करने का भार आता है। आरोपी पर खुद को निर्दोष साबित करने का प्रतिलोम भार होता है इसलिए अभियोजन को वैधानिक प्रावधानों के साथ अनुपालन के लिए सख्त परीक्षण रखना चाहिए। अगर किसी भी स्तर पर,अभियुक्त अपने बचाव में उसको दोषी मानने के अनुमान में संदेह पैदा करने में सक्षम रहा हो तो निश्चित तौर पर इसका लाभ आरोपी को ही होगा।"

इस मामले में कोर्ट ने कहा कि सीज किए गए सैंपल को पेश करने में देरी की गई और सील पर किए गए हस्ताक्षर से भी अभियोजन पक्ष के केस पर संदेह पैदा हो गया। कोर्ट ने कहा कि आरोपी व गवाहों के हस्ताक्षर के बीच में काफी सारी खाली जगह छोड़ी गई थी। जो मामले पर संदेह पैदा करती है कि कुछ असामान्य था। वैसे भी इस बात को इतनी आसानी से नहीं छोड़ा जा सकता है,जबकि स्वतंत्र गवाहों ने यह बयान दिया है कि सीज करने के समय पर मौके पर नहीं थे।

वहीं अभियोजन पक्ष की तरफ से दलील दी गई कि जब किसी मामले में सैंपल पेश किए जाते है या किसी मामले में बिल्कुल सैंपल पेश नहीं किए जाते है,इन दोनों केस में फर्क होता है। दलील दी गई कि भले ही यह व्ह सैंपल ना हो परंतु जब मामले में एफएसएल रिपोर्ट पेश कर दी गई है तो इससे आरोपी को कोई क्षति नहीं पहुंची है। पीठ ने कहा कि-

"किसी मामले में सैंपल पेश न करने या ऐसा सैंपल पेश करना,जिसका संबंध आरोपी से जब्त किए गए सामान से स्थापित न हो पाए,इन दोनों मामलों में कोई खास अंतर नहीं है। दोनों मामलों में यह संदिग्ध हो जाएगा जो एफएलएल रिपोर्ट पेश की गई है क्या वह सचमुच में आरोपी से जब्त किए गए नमूने की है या नहीं।''

आरोपी को बरी करते हुए पीठ ने कहा कि आरोपी से सीज किए गए व कोर्ट में पेश किए गए नमूने की पहचान संदिग्ध है। ऐसे में एफएसएल रिपोर्ट भी अपनी महत्वता खो रही है और इसका लाभ आरोपी को जाएगा। इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ दिया जा रहा है। 



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