राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने CJI को लिखा पत्र, दिल्ली पुलिस पर लगाया मारपीट का आरोप; न्यायिक दखल की मांग की
राज्यसभा सांसद और CPI(M) नेता जॉन ब्रिटास ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) को पत्र लिखकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान उनके साथ हुई पुलिस की बर्बरता की "चौंकाने वाली घटना" पर दखल देने की मांग की।
उन्होंने कहा कि एक विश्वसनीय जांच को पूरी तरह से उस चेन ऑफ़ कमांड पर नहीं छोड़ा जा सकता, जिसके कर्मचारी या सुपरवाइजरी अधिकारी खुद इसमें शामिल हो सकते हैं। उन्होंने अनुरोध किया कि इस पत्र को सुप्रीम कोर्ट की उचित बेंच के सामने विचार के लिए रखा जाए, ताकि कानून के अनुसार न्यायिक दखल पर विचार किया जा सके, जिसमें मामले का संज्ञान लेना या संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत उचित कार्यवाही का निर्देश देना शामिल है।
अपनी घटना का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा है कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते समय उन्हें जबरदस्ती घसीटा गया:
"आज (रविवार) दोपहर लगभग 12.30 बजे, जब मुझे पता चला कि कुछ युवा कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट की जा रही है और उन्हें हिरासत में लिया जा रहा है तो मैं कनॉट प्लेस इलाके में पहुंचा और पत्रकारों से बात करने लगा। मैं शांतिपूर्वक प्रेस से बात करने के अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल कर रहा था। इसके बावजूद, दिल्ली पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के जवानों ने मेरे और वहां मौजूद पत्रकारों के बार-बार यह बताने के बावजूद कि मैं मौजूदा सांसद हूं, मेरे साथ जबरदस्ती की और मुझे लगभग 50 मीटर तक घसीटा। कुछ पुलिसकर्मियों ने मुझे हवा में उठाया और पुलिस वाहन की ओर ले गए, एक मौजूदा सांसद के साथ ऐसा व्यवहार किया जैसे मैं कोई ऐसी वस्तु हूं, जिसे घसीटकर ले जाया जा रहा हो। इस मनमानी कार्रवाई को सही ठहराने के लिए कोई उकसावा नहीं था।"
CJI को लिखे पत्र में उन्होंने कहा कि यह घटना व्यक्तिगत स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति के अधिकार, पुलिस की जवाबदेही और उन संवैधानिक सुरक्षा उपायों के पालन के बारे में गंभीर सवाल उठाती है जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार अपने महत्वपूर्ण फैसलों के माध्यम से बरकरार रखा और दोहराया।
उन्होंने कहा कि यह मारपीट आज सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश के कुछ घंटों के भीतर हुई, जिसमें कहा गया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा,
"इसलिए इस बात की तत्काल न्यायिक जांच की आवश्यकता है कि क्या इस माननीय न्यायालय द्वारा दोहराए गए संवैधानिक सुरक्षा उपायों का वास्तव में सम्मान किया गया।"
उन्होंने आगे कहा कि गाड़ी में बिठाए जाने के बाद उनके साथ बर्बरता और बढ़ गई।
पत्र में कहा गया,
"पुलिस वालों ने मुझ पर हमला किया और मुझे सीट पर दबा दिया। जब मैंने बताया कि मैं सांसद हूं, तब भी हमला जारी रहा। एक चुने हुए प्रतिनिधि होने के बावजूद, उन्होंने मेरे साथ अपमानजनक और शारीरिक रूप से हिंसक व्यवहार किया। बाद में मुझे सड़क किनारे छोड़ दिया गया, क्योंकि संबंधित DCP ने मुझे छोड़ने का आदेश दिया था; उन्हें मेरी हिरासत पूरी तरह से गैर-कानूनी लगी थी।"
उन्होंने पत्रकारों और आस-पास मौजूद लोगों द्वारा बनाई गई कई रिकॉर्डिंग का भी ज़िक्र किया।
जॉन का कहना है कि पुलिस द्वारा हिंसा की ये कोई इक्का-दुक्का घटनाएँ नहीं हैं, क्योंकि कल विपक्ष के कई नेताओं को हिरासत में लिया गया, जिनमें केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन भी शामिल हैं।
ब्रिटास ने आगे कहा कि शांतिपूर्ण विरोध को सिर्फ़ इसलिए खतरा नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह सत्ता में बैठे लोगों को चुनौती देता है।
उन्होंने कहा,
"अधिकारी इन मांगों से सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन वे इनका जवाब शारीरिक हिंसा से नहीं दे सकते। सरकार लोकतंत्र को डरा-धमकाकर चुप नहीं करा सकती। वह पुलिस का इस्तेमाल राजनीतिक बदले की भावना से नहीं कर सकती। वह तर्क की ताकत की जगह लाठी की ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकती। और वह लोगों से यह उम्मीद नहीं कर सकती कि वे अपनी संवैधानिक आज़ादी छोड़ दें, सिर्फ़ इसलिए कि सत्ता में बैठे लोगों को असहमति पसंद नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) बोलने की आज़ादी और शांतिपूर्ण सभा की रक्षा करते हैं, जबकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत आज़ादी की सुरक्षा करता है। किसी भी रोक या हिरासत का कानूनी आधार होना चाहिए, और बल का कोई भी इस्तेमाल ज़रूरी, कानूनी और उचित होना चाहिए। जिस बर्बर हमले का मैंने सामना किया, जिन हालात में मुझे ले जाया गया और जिस तरह से मुझे छोड़ा गया, उन सबकी इन संवैधानिक गारंटियों और पुलिस के व्यवहार व हिरासत से जुड़े कानूनों और नियमों के तहत तुरंत जांच होनी चाहिए।"
मांगी गई राहतें
ब्रिटास ने खास तौर पर एक स्वतंत्र और कोर्ट की देखरेख में जांच के लिए निर्देश मांगें। यह जांच या तो एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) करे जिसमें दिल्ली पुलिस और CRPF के शामिल अधिकारियों से अलग अधिकारी हों, या फिर कोर्ट जिसे सही समझे, वह स्वतंत्र एजेंसी यह जांच करे।
उनके कहे अनुसार, जांच में शामिल सभी कर्मियों की पहचान और भूमिका का पता लगाया जाना चाहिए, सुपरवाइजरी अधिकारियों की ज़िम्मेदारी की जांच होनी चाहिए, और उन्हें हटाने, उन पर हमले और उनकी रिहाई के हालात और कानूनी आधार का पता लगाया जाना चाहिए। कोर्ट एक तय समय-सीमा के भीतर स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दे सकता है।
इस मामले पर विचार होने तक, उन्होंने ज़रूरी सबूतों को सुरक्षित रखने के लिए भी तुरंत निर्देश देने की मांग की। इन सबूतों में पूरी और बिना एडिट की हुई वीडियो रिकॉर्डिंग, फुटेज, गाड़ी की पहचान, तैनाती और मूवमेंट के रिकॉर्ड, ड्यूटी रोस्टर, आदेश और निर्देश, वायरलेस और कंट्रोल-रूम लॉग, और उनकी हिरासत और रिहाई से जुड़े रिकॉर्ड शामिल हैं।