POCSO- 'नाबालिग पीड़ितों को न्यायिक प्रक्रिया में भागीदारी का अधिकार' : बॉम्बे हाईकोर्ट ने दिशानिर्देश जारी किए

Update: 2021-04-08 10:58 GMT

बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम 2012 (POCSO ACT ) के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए दिशा-निर्देश जारी किए और सुनिश्चित किया कि न्यायिक प्रक्रिया के विभिन्न चरणों में पीड़ित बच्चे के भागीदारी का अधिकार सुरक्षित है।

मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जीएस कुलकर्णी की खंडपीठ ने अन्य निर्देशों के साथ स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट किशोर (एसजेपीयू) को निर्देश दिया कि अगर पीड़ित के परिवार, अभिभावक या कानूनी वकील अदालत के कार्यवाही के संबंध में नोटिस नहीं देते हैं तो वह लिखित रूप में अदालत को कारण बताएं।

जब अभियोजन पक्ष की ओर से एक आवेदन किया जाता है, तो यह सरकारी वकील का कर्तव्य होगा कि वह बच्चे के परिवार को इस तरह के आवेदन की सुनवाई का नोटिस जारी करे और जहां अभिभावक और बच्चे की ओर से वकील पहले से ही रिकॉर्ड पर है, ऐसे वकील के साथ-साथ सभी प्रासंगिक दस्तावेजों और कार्यवाही में प्रभावी भागीदारी के लिए आवश्यक रिकॉर्ड के लिए वकील की ओर से नोटिस जारी किया जाना चाहिए।

खंडपीठ ने कहा कि इस तरह के आवेदन को सुनने से पहले ट्रायल कोर्ट को नोटिस की स्थिति का पता लगाना चाहिए और यदि ऐसा पाया जाता है कि नोटिस जारी नहीं किया गया है, तो अदालत पीड़िता की अनुपस्थिति में आवेदन से निपटने वाले किसी भी आकस्मिक स्थितियों को ध्यान में रखते हुए न्याय की रक्षा के लिए उचित आदेश दे सकता है।

कोर्ट ने कहा कि अगर पीड़ित परिवार प्रभावी नोटिस के बावजूद पेश नहीं होता है, तो अदालत मामले की सुनवाई के लिए आगे बढ़ सकती है।

बेंच ने अर्जुन मालगे द्वारा दायर जनहित याचिका पर आदेश पारित किया, जो पूरे मुंबई में यौन शोषण के शिकार और उनके परिवारों के लिए काम करता है। वह पोक्सो नियमों के नियम 4 (7) के मद्देनजर बाल कल्याण समिति के आदेशों के अनुसार बाल यौन शोषण मामलों में एक सहायक व्यक्ति के रूप में कार्य करता है।

अधिवक्ता सोमशेखर सुंदरसेन ने प्रस्तुत किया कि निम्नलिखित प्रावधान जैसे पोक्सो अधिनियम की धारा 40, पोक्सो नियम 2020 के नियम 4 का उप नियम 13 और सीआरपीसी की धारा 439 (1-A) में से कोई भी प्रावधान प्रचलित नहीं है।

पोक्सो अधिनियम की धारा 40 में कहा गया है कि पीड़ित को वकील से कानूनी सहायता प्राप्त करने का अधिकार है। पोक्सो नियम 2020 के नियम 4 (13) में कहा गया है कि पुलिस को पीड़ित को अदालती कार्यवाही के बारे में सूचित करना चाहिए जिसमें जमानत के लिए आवेदन पत्र, अदालत की कार्यवाही की अगली तारीख आदि शामिल होता है।

साल 2018 में दंड प्रक्रिया संहिता(सीआरपीसी) धारा 439 (1-ए) में हुए संशोधन के मुताबिक पुलिस द्वारा पीड़ितों / शिकायतकर्ताओं को पोक्सो अधिनियम के दायरे में आने वाले मामलों में आरोपियों द्वारा स्थानांतरित किए गए जमानत आवेदनों के बारे में सूचित किया जाना चाहिए।

याचिका में कहा गया है कि,

"यौन शोषण से बच्चों का संरक्षण करने और यौन उत्पीड़न के नाबालिग पीड़ित को त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम 2012 (POCSO ACT ) बनाया गया। पोक्सो अधिनियम, 2012 की धारा 40 के नियम 4 के तहत नाबालिग पीड़ितों को न्याय प्रक्रिया में न्यायोचित तरीके से भागीदारी का अधिकार है और इसके लिए जरूरी है कि पीड़ित को अदालत की कार्यवाही के बारे में सूचित किया जाए।"

आगे कहा गया है कि,

"आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018 के तहत दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 439 (1-ए) के तहत भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 की उप-धारा(3) या धारा 376AB या धारा 376DA या धारा 376DB की धारा (3) के तहत दर्ज मुकदमे में आरोपी की जमानत अर्जी की सुनवाई के समय सूचना देने वाला या उसके द्वारा अधिकृत किसी व्यक्ति की उपस्थिति अनिवार्य है।"

बेंच ने निर्णय की कॉपी को महाराष्ट्र के सभी सत्र न्यायालयों के सभी पीठासीन अधिकारियों, महाराष्ट्र पुलिस के महानिदेशक और महाराष्ट्र राज्य के पुलिस अधीक्षक, अभियोजन निदेशक और महाराष्ट्र राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों में सर्कुलेट करने का निर्देश दिया।

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