भ्रष्टाचार मामले में DIC एच.एस. भुल्लर को हाईकोर्ट से नहीं मिली जमानत

Update: 2026-02-17 10:35 GMT

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब पुलिस के सीनियर अधिकारी हरचरण सिंह भुल्लर उर्फ एच.एस. भुल्लर की नियमित जमानत याचिका खारिज की। यह मामला सीबीआई (CBI) द्वारा दर्ज भ्रष्टाचार प्रकरण से जुड़ा है।

जस्टिस सुमीत गोयल ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण कानून की धारा 7 के तहत लगाया गया। आरोप विशेषकर इतने सीनियर अधिकारी के खिलाफ आपराधिक न्याय प्रणाली की निष्पक्षता पर गंभीर प्रभाव डालता है और कानून व्यवस्था में जनता के विश्वास को कमजोर करता है। अदालत ने कहा कि अपराध की गंभीरता और याचिकाकर्ता का पद नियमित जमानत पर विचार करते समय महत्वपूर्ण कारक हैं।

मामला

CBI द्वारा 16 अक्टूबर, 2025 को दर्ज FIR के अनुसार 11 अक्टूबर 2025 को आकाश बट्टा द्वारा दी गई लिखित शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया गया। आरोप है कि उस समय रोपड़ रेंज के DIG पद पर तैनात भुल्लर ने एक निजी मध्यस्थ कृष्णु शारदा के माध्यम से 8 लाख रुपये की अवैध रिश्वत की मांग की थी। यह कथित रिश्वत FIR नंबर 155/2023, थाना सरहिंद में दर्ज मामले में अनुकूल कार्रवाई सुनिश्चित करने और शिकायतकर्ता के व्यवसाय के खिलाफ कोई दंडात्मक कदम न उठाने के बदले मांगी गई।

CBI ने गोपनीय सत्यापन, रिकॉर्डेड बातचीत और नियंत्रित कॉल के बाद 16 अक्टूबर 2025 को चंडीगढ़ में जाल बिछाया। सह-आरोपी को कथित रूप से 5 लाख रुपये की रिश्वत राशि स्वीकार करते हुए पकड़ा गया। उसी दिन भुल्लर को गिरफ्तार कर लिया गया। 3 दिसंबर, 2025 को अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गई। इससे पहले 2 जनवरी, 2026 को विशेष CBI कोर्ट, चंडीगढ़ उनकी जमानत याचिका खारिज कर चुका था।

अदालत की टिप्पणियां

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री, जैसे रिकॉर्डेड बातचीत, सत्यापन रिपोर्ट और ट्रैप कार्यवाही, प्रथम दृष्टया अवैध मांग और आंशिक रिश्वत प्राप्ति की ओर संकेत करती है। इस चरण पर इन साक्ष्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही आरोपी के पास से सीधे धन बरामद नहीं हुआ हो, लेकिन यदि मध्यस्थ के माध्यम से रिश्वत स्वीकार करने का आरोप है तो मात्र प्रत्यक्ष बरामदगी का अभाव जमानत का आधार नहीं बन सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि केवल निलंबित होने से यह मान लेना उचित नहीं कि आरोपी गवाहों को प्रभावित नहीं कर सकता। कई गवाह पुलिस कर्मी और सरकारी अधिकारी हैं, जो पूर्व में उनके प्रशासनिक नियंत्रण में रहे हैं। ऐसे में गवाहों को प्रभावित करने की आशंका को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

अदालत ने जमानत के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि जमानत विवेकाधीन है, परंतु इसे न्यायोचित तरीके से प्रयोग किया जाना चाहिए। प्रथम दृष्टया साक्ष्य, अपराध की गंभीरता, गवाहों को प्रभावित करने की संभावना और न्याय प्रक्रिया पर प्रभाव जैसे पहलुओं पर विचार आवश्यक है।

चूंकि अभी आरोप तय नहीं हुए और प्रमुख गवाहों की जांच शेष है, अदालत ने अभियोजन और शिकायतकर्ता की आशंकाओं को उचित माना और जमानत याचिका खारिज की।

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