दुर्भावनापूर्ण मंशा नहीं: धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप में एक्टर राजकुमार राव के खिलाफ FIR रद्द

Update: 2026-06-06 04:43 GMT

फिल्म 'बहन होगी तेरी' के प्रचार पोस्टर को लेकर एक्टर राजकुमार राव के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि किसी रचनात्मक कृति में किया गया चित्रण, यदि उसमें जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण मंशा न हो तो भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295-ए के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।

जस्टिस एच.एस. ग्रेवाल ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत कलात्मक और रचनात्मक अभिव्यक्ति को संरक्षण प्राप्त है। फिल्मों, रचनात्मक कृतियों और कलात्मक प्रस्तुतियों से जुड़े मामलों में आपराधिक मुकदमा तभी चलाया जा सकता है, जब आरोपित अपराध के सभी आवश्यक तत्व स्पष्ट रूप से मौजूद हों।

मामला वर्ष 2017 में जालंधर में दर्ज उस FIR से जुड़ा था, जिसमें राजकुमार राव, फिल्म के निर्माता और अन्य लोगों पर हिंदू धार्मिक भावनाएं आहत करने का आरोप लगाया गया। शिकायत में कहा गया कि सोशल मीडिया पर प्रसारित एक प्रचार पोस्टर में भगवान शिव का चित्रण आपत्तिजनक और हास्यात्मक तरीके से किया गया।

जांच के बाद वर्ष 2022 में एक्टर, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर्स के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया। याचिकाकर्ताओं ने FIR, आरोपपत्र और उनके खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट को रद्द करने की मांग की थी।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि धारा 295-ए के तहत अपराध साबित करने के लिए आवश्यक जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण मंशा का कोई साक्ष्य रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है। अदालत ने कहा कि केवल किसी व्यक्ति या समूह की आपत्ति या विरोध को धार्मिक भावनाएं भड़काने की मंशा का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित पोस्टर एक फिल्म के प्रचार अभियान का हिस्सा था और वैध रचनात्मक गतिविधि के तहत जारी किया गया था। हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि कुछ याचिकाकर्ता स्वयं हिंदू धर्म के अनुयायी और भगवान शिव के भक्त हैं, जिससे जानबूझकर अपमान करने के आरोप और कमजोर पड़ जाते हैं।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 67 के आरोप को भी अदालत ने खारिज किया। हाईकोर्ट ने कहा कि प्रचार सामग्री में अश्लीलता, कामुकता या अभद्र सामग्री का कोई तत्व नहीं था। शिकायत का संबंध धार्मिक भावनाओं से था, न कि अश्लील सामग्री से, इसलिए इस धारा का प्रयोग उचित नहीं है।

अदालत ने फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) द्वारा दिए गए 'यूए' प्रमाणपत्र को भी महत्वपूर्ण माना। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी वैधानिक विशेषज्ञ संस्था द्वारा जांच के बाद दिया गया प्रमाणपत्र कानूनी महत्व रखता है और उसे हल्के में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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