जब तक हाथ से मैला उठाने की शर्मनाक प्रथा जारी है, हर भारतीय अपने सिर पर गंदगी ढो रहा है: जस्टिस धूलिया
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस सुधांशु धूलिया ने आज कहा कि उन्हें हाथ से मैला उठाने की प्रथा के जारी रहने पर शर्म आती है।
उन्होंने कहा,
"...सेमिनार के दौरान कई ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं, जिनसे या तो खुशी होती है या गुस्सा आता है। लेकिन शायद ही कभी ऐसा महसूस होता हो कि शर्म से सिर झुक जाए। मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हो रही है। मेरी बहन नारायणन अम्मा [आंध्र प्रदेश में हाथ से मैला उठाने का काम करने वाली पूर्व महिला], अकेली ऐसी नहीं हैं, जो अपने सिर पर गंदगी ढो रही हैं। मुझे लगता है कि मैं भी अपने सिर पर गंदगी ढो रहा हूं। जब तक यह सिस्टम जारी है, हर भारतीय अपने सिर पर गंदगी ढो रहा है। जब मैं सुप्रीम कोर्ट में था, रिटायरमेंट से कुछ महीने पहले जस्टिस अरविंद कुमार और मेरे सामने एक केस आया था। यह केस उन लोगों से जुड़ा था, जो बिना किसी सुरक्षा उपकरण के मैनहोल में उतरते थे और आखिरकार [ज़हरीली गैसें सूंघने से] मर जाते थे।"
जस्टिस धूलिया 'सफाई कर्मचारी आंदोलन' के 'इंडिया@80 एंड मैनुअल स्कैवेंजिंग' (India@80 End Manual Scavenging) कैंपेन के तहत बोल रहे थे। यह कैंपेन भारत को हाथ से मैला उठाने और सीवर की सफाई करने की असंवैधानिक प्रथा से मुक्त कराने के लिए साल भर चलाया जा रहा है।
गौरतलब है कि जस्टिस धूलिया ने जस्टिस कुमार के साथ मिलकर डॉ. बलराम सिंह की जनहित याचिका पर सुनवाई की। इस याचिका में कहा गया कि 'एम्प्लॉयमेंट ऑफ़ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड कंस्ट्रक्शन ऑफ़ ड्राई लैट्रिन्स (प्रोहिबिशन) एक्ट, 1993' और 'प्रोहिबिशन ऑफ़ एम्प्लॉयमेंट एज़ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन एक्ट, 2013' के ज़रूरी प्रावधानों को लागू नहीं किया गया, जबकि कानून में ऐसा करने का आदेश दिया गया।
बेंच ने 20 अक्टूबर, 2023 के फैसले के पालन की निगरानी की। इस फैसले में हाथ से मैला उठाने के काम के दौरान होने वाली मौतों के मामलों में मुआवज़ा बढ़ाकर 30 लाख रुपये किया गया और अन्य निर्देश भी दिए गए। कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा दाखिल अनुपालन हलफनामे (Compliance Affidavit) पर कड़ा रुख अपनाया और कहा कि इस बात पर कोई स्पष्टता नहीं है कि क्या यह प्रथा खत्म हो गई। कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट "बिल्कुल भी उत्साहजनक नहीं" है और कोर्ट इस प्रथा को खत्म करने के लिए "किसी भी हद तक" जा सकता है।
बाद में बेंच ने दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बैंगलोर और हैदराबाद में हाथ से मैला उठाने और सीवर की सफाई करने की प्रथा पर रोक लगाने के आदेश दिए। जस्टिस धूलिया के रिटायरमेंट के बाद जस्टिस कुमार की बेंच आगे के निर्देशों के लागू होने पर नज़र रख रही है।
जस्टिस धूलिया ने आगे कहा कि इस प्रथा पर रोक लगाने वाले फैसलों के बावजूद, यह अभी भी जारी है। उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि सुप्रीम कोर्ट परिसर में ही सीवर की मैन्युअल सफाई (हाथों से सफाई) जैसी असंवैधानिक प्रथा चल रही थी।
उन्होंने आगे कहा,
"हमें पता चला कि सुप्रीम कोर्ट परिसर में यह प्रथा चल रही है। हमने बॉम्बे जैसे बड़े महानगरों में इस प्रथा पर रोक लगाई... हर जगह एक बात आम दिखी कि अधिकारी यह मानने को तैयार नहीं थे कि यह प्रथा कहीं भी अब भी चल रही है। जब उन्हें तथ्य दिखाए गए तो उन्होंने दावा किया कि उनके अधिकार क्षेत्र या विभाग में यह प्रथा नहीं होती है।"
इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन लोकुर और पटना हाई कोर्ट की पूर्व जज व अब सीनियर एडवोकेट जस्टिस अंजना प्रकाश भी मौजूद थीं।