Delhi Riots: अदालत ने मस्जिद में आगजनी के मामले में पांच लोगों को बरी किया, चश्मदीदों के बयानों को अविश्वसनीय माना
दिल्ली कोर्ट ने फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान शहर के करावल नगर इलाके में 'अल्लाह वाली मस्जिद' में तोड़फोड़ और आगजनी के मामले में आरोपी पांच लोगों को बरी कर दिया।
कड़कड़डूमा कोर्ट के एडिशनल सेशंस जज परवीन सिंह ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों का दोष बिना किसी उचित संदेह के साबित करने में विफल रहा।
अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष के गवाह भरोसेमंद नहीं थे। साथ ही दिल्ली पुलिस द्वारा पेश की गई CCTV फुटेज को भी सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सका, क्योंकि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के तहत इसके लिए जरूरी वैध प्रमाण पत्र मौजूद नहीं थे।
जज ने अंकित, सौरभ शर्मा, रोहित, राहुल कुमार और सचिन को बरी कर दिया। इन पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 147, 148, 149, 188, 427, 435, 436 और 450 के तहत आरोप लगे थे। रोहित पर IPC की धाराओं 109 और 114 के तहत भी आरोप लगाए गए।
अदालत ने आरोपियों को 'संदेह का लाभ' (Benefit of Doubt) देते हुए सभी आरोपों से बरी किया।
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि 24 फरवरी 2020 को 'अल्लाह वाली मस्जिद' में आग लगा दी गई। यह भी आरोप लगाया गया कि मस्जिद के बाहर एक चबूतरे पर एक मूर्ति रखी गई थी और मस्जिद की चारों मंजिलों पर मौजूद सामान को आग के हवाले कर दिया गया।
जांच के दौरान, पुलिस ने इलाके से CCTV फुटेज हासिल की और इन पांचों आरोपियों की पहचान दंगाई भीड़ के सदस्यों के रूप में की।
अभियोजन पक्ष ने 14 गवाहों से पूछताछ की, जिनमें दो पुलिसकर्मी भी शामिल थे। इन पुलिसकर्मियों का दावा था कि उन्होंने घटना को अपनी आंखों से देखा था और CCTV फुटेज के जरिए आरोपियों की पहचान की थी।
आरोपियों को बरी करते हुए अदालत ने गौर किया कि अभियोजन पक्ष के मामले में मस्जिद में तोड़फोड़ और आगजनी की दो घटनाएं शामिल थीं — एक 24 फरवरी 2020 को रात करीब 11 बजे और दूसरी 25 फरवरी 2020 को सुबह करीब 11 बजे। अदालत ने यह भी गौर किया कि मस्जिद के सामने रहने वाले स्वतंत्र गवाह, अली अहमद ने गवाही दी थी कि उसने जो घटना देखी, वह रात लगभग 8:15 बजे हुई थी। उसने बताया कि भीड़ ने मस्जिद में तोड़फोड़ की और उसे आग लगाई, लेकिन उसने किसी भी आरोपी की पहचान नहीं की।
अदालत ने पाया कि 24 फरवरी को रात 11 बजे हुई कथित घटना, या उसमें आरोपियों की भागीदारी को साबित करने के लिए कोई गवाह नहीं था।
25 फरवरी की कथित घटना के संबंध में अदालत को पुलिस गवाहों - ASI जुनैद और ASI मिथिलेश - के बयानों में विरोधाभास मिले।
अदालत ने ध्यान दिया कि अली अहमद ने कहा था कि मस्जिद में तोड़फोड़ केवल एक बार हुई, और घटना के बाद वह लगभग चार दिनों तक अपने घर में ही बंद रहा था।
अदालत ने कहा,
"25.02.2020 को सुबह लगभग 11:00 बजे मस्जिद में हुई तोड़फोड़ और आगजनी के संबंध में PW10 और PW11 की गवाहियां विश्वसनीय नहीं हैं।"
इसके अलावा, जज ने गौर किया कि पुलिस गवाहों ने घटनास्थल पर अपनी मौजूदगी और उस दौरान अपनी गतिविधियों के बारे में अलग-अलग बातें बताईं।
अदालत ने माना कि मस्जिद में हुई कथित दंगा-फसाद और आगजनी में आरोपियों की संलिप्तता साबित करने के लिए इन दो पुलिसकर्मियों की गवाहियों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
अदालत ने दंगों में आरोपियों की भागीदारी साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष द्वारा CCTV फुटेज पर निर्भर रहने के तर्क को भी खारिज किया। अदालत ने पाया कि इसके लिए दिया गया सर्टिफिकेट 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम' (Indian Evidence Act) की धारा 65B की शर्तों को पूरा नहीं करता है।
अदालत ने कहा,
"इस प्रकार, यह सर्टिफिकेट भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है।"
अदालत ने यह भी माना कि CCTV फुटेज वाली DVD को सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनके संबंध में धारा 65B का कोई वैध सर्टिफिकेट साबित नहीं किया गया था।
इसके अनुसार, अदालत ने पांचों आरोपियों को 'संदेह का लाभ' (Benefit of Doubt) देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया।