सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इस महत्वपूर्ण सवाल पर विचार करने की सहमति जताई कि क्या बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI), जो कानूनी पेशे की वैधानिक नियामक संस्था है, लॉ कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज के कामकाज को नियंत्रित और रेगुलेट करने की शक्ति रखती है?

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ BCI-PEARL FIRST Trust के कामकाज और ट्रस्ट द्वारा स्थापित लॉ संस्थानों से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।

“BCI लॉ कॉलेजों को कैसे नियंत्रित कर सकता है? यही असली सवाल है”

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि अदालत इस बात की जांच करना चाहती है कि क्या BCI के पास यूनिवर्सिटी या लॉ कॉलेजों को नियंत्रित और रेगुलेट करने की वैधानिक शक्ति है।

CJI ने मौखिक रूप से कहा:

“BCI लॉ कॉलेजों को कैसे रेगुलेट कर सकता है? यही असली सवाल है।”

पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि कानूनी शिक्षा को रेगुलेट करने के लिए BCI को विशेषज्ञ संस्था क्यों माना जाए, जबकि अकादमिक मामलों के लिए कानून के विद्वान और शिक्षाविद अधिक उपयुक्त हो सकते हैं।

CJI ने कहा कि BCI सामान्य दिशानिर्देश तय कर सकता है, जैसे लॉ कोर्स चार साल का हो या पांच साल का, लेकिन सवाल यह है कि क्या वह कानूनी शिक्षा के संचालन और संस्थानों पर नियंत्रण भी रख सकता है।

BCI-PEARL FIRST Trust को लेकर क्या मामला है?

याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट प्रशांत भूषण पेश हुए। उन्होंने आरोप लगाया कि BCI ने 2016 में अपने पुराने ट्रस्ट को समाप्त कर उसके फंड को नए ट्रस्ट में ट्रांसफर करने का प्रस्ताव पारित किया था। उन्होंने बाद में बनाए गए BCI-PEARL FIRST Trust और उससे जुड़े संस्थानों पर भी सवाल उठाए।

भूषण ने यह भी आरोप लगाया कि BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को ट्रस्ट का आजीवन ट्रस्टी बनाया गया था।

उनके अनुसार, ट्रस्ट ने गोवा और आंध्र प्रदेश में लॉ कॉलेज स्थापित किए हैं।

उन्होंने दो राज्य कानूनों का भी हवाला दिया, जिनके तहत इन संस्थानों के प्रशासन में BCI की महत्वपूर्ण भूमिका होने का दावा किया गया।

“Regulator खुद वही संस्था कैसे चला सकता है जिसे उसे रेगुलेट करना है?”

प्रशांत भूषण ने दलील दी कि यदि BCI एक रेगुलेटर है, तो वह उसी लॉ कॉलेज को खुद कैसे चला सकता है जिसे उसे रेगुलेट करना है।

उन्होंने कहा:

“रेगुलेटर इस लॉ कॉलेज को नहीं चला सकता।”

उन्होंने इसे हितों के टकराव (Conflict of Interest) का मुद्दा बताया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी सवाल उठाया गया कि प्रस्तावित संस्थानों की फीस संरचना क्या होगी। भूषण ने ₹25,000 की प्रस्तावित फीस का उल्लेख किया।

BCI की ओर से क्या कहा गया?

BCI की ओर से सीनियर एडवोकेट गुरु कृष्ण कुमार ने पक्ष रखा।

उन्होंने बताया कि कोर्ट की पिछली टिप्पणियों के बाद BCI ने इस मुद्दे पर विचार किया है। उन्होंने कहा कि अब BCI ने एक प्रस्ताव पारित किया है जिसके तहत कोई आजीवन ट्रस्टी नहीं होगा।

ट्रस्टियों का कार्यकाल उनके BCI सदस्य के रूप में कार्यकाल के साथ ही समाप्त होगा।

हालांकि, प्रशांत भूषण ने कहा कि केवल ट्रस्टियों के कार्यकाल में बदलाव करने से मूल वैधानिक प्रावधानों का सवाल खत्म नहीं होता। उनके अनुसार, कानूनों में अभी भी BCI को संस्थानों पर पर्याप्त नियंत्रण दिया गया है।

CJI ने BCI की विशेषज्ञता पर भी सवाल उठाया

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि कानूनी शिक्षा के नियमन में अकादमिक विशेषज्ञों और कानून के विद्वानों की भूमिका महत्वपूर्ण होनी चाहिए।

उन्होंने कहा:

“BCI कानूनी शिक्षा को रेगुलेट करने के लिए विशेषज्ञ संस्था कैसे है? उन्हें कानूनी शिक्षा के बारे में क्या पता है? कानून के विद्वान और शिक्षाविद हैं...”

हालांकि, CJI ने यह भी स्पष्ट किया कि BCI सामान्य दिशानिर्देश तय कर सकता है।

उदाहरण के तौर पर उन्होंने कहा कि BCI यह निर्धारित कर सकता है कि लॉ कोर्स चार साल का हो या पांच साल का, लेकिन सवाल यह है कि क्या BCI को कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज पर प्रत्यक्ष नियंत्रण रखने की शक्ति है।

सुप्रीम कोर्ट ने BCI से जवाब मांगा

पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया से जवाब मांगा है।

अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट मुख्य रूप से इस वैधानिक प्रश्न की जांच करेगा कि:

क्या कानूनी पेशे के नियामक के रूप में BCI की शक्तियां लॉ कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज की कानूनी शिक्षा तथा उनके प्रशासन को नियंत्रित करने तक विस्तारित होती हैं?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका असर BCI की भूमिका, लॉ कॉलेजों के नियमन और भारत में कानूनी शिक्षा के प्रशासनिक ढांचे पर पड़ सकता है।

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