तत्कालीन BJP MLA आरसी यादव के खिलाफ 2012 के दंगा मामले को वापस लेने की हाईकोर्ट ने दी अनुमति

Update: 2026-05-06 04:20 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें राज्य सरकार के उस आवेदन को खारिज किया गया था, जिसमें 2012 की मूर्ति विसर्जन दंगा घटना के संबंध में BJP विधायक (रुदौली से) राम चंद्र यादव के खिलाफ आपराधिक मुकदमा वापस लेने की मांग की गई थी।

मुकदमा वापस लेने के राज्य का अनुरोध स्वीकार करते हुए जस्टिस राजीव सिंह की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष पब्लिक प्रॉसिक्यूटर का आवेदन "रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद सद्भावना में" दायर किया गया।

यह आदेश विधायक यादव द्वारा दायर CrPC की धारा 482 के तहत याचिका और उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया गया।

संक्षेप में मामला

अभियोजन पक्ष के मूल मामले के अनुसार, 24 अक्टूबर, 2012 को मूर्तियां विसर्जन के लिए ले जा रहे कुछ ट्रैक्टरों के कारण रुदौली पुलिस स्टेशन के सामने ट्रैफिक जाम हो गया। हालांकि, पुलिस ने ड्राइवरों को आगे बढ़ने का निर्देश दिया, लेकिन उन्होंने इसका पालन नहीं किया।

यह दावा किया गया कि आवेदक। उस समय स्थानीय विधायक थे। उन्होंने उन्हें निर्देश दिया था कि वे मूर्तियों को वहीं रोककर रखें, जब तक कि वह पुलिस स्टेशन के सामने न पहुंच जाएं। इसके कारण, घटनास्थल पर भारी भीड़ जमा हो गई।

इसके बाद जब विधायक यादव घटनास्थल पर पहुंचे तो उन्होंने पुलिस को बताया कि जब श्रद्धालु एक मस्जिद के पास से गुजर रहे थे, तो दूसरे समुदाय का एक लड़का गलती से रंग से सराबोर हो गया। कथित तौर पर इसके कारण गाली-गलौज और झगड़ा हुआ, जिसके दौरान एक मूर्ति भी टूट गई।

FIR में आरोप लगाया गया कि आवेदक ने भड़काऊ बयान दिए। यह मांग की कि जुलूस आगे बढ़ने से पहले दोषियों को दंडित किया जाए। हालांकि, बाद में उनकी सलाह पर ट्रैक्टरों की आवाजाही शुरू हो गई, लेकिन तब तक गाँव में लगभग 2,000 से 3,000 लोग जमा हो चुके थे।

इसके बाद आवेदक की कथित उकसाहट पर 250-300 लोग उस गाँव की ओर बढ़ने लगे, जहां दूसरे समुदाय के लोगों के साथ विवाद हुआ था।

हालांकि, पुलिसकर्मियों ने उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने बात नहीं मानी और दूसरे समुदाय के लोगों पर पथराव शुरू किया। पुलिस पर भी हमला किया, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हो गए।

इसलिए आवेदक के खिलाफ संबंधित FIR दर्ज की गई। बाद में जून 2020 में राज्य सरकार ने इस FIR से जुड़े मुकदमे को वापस लेने का आदेश पारित किया। अक्टूबर, 2021 में ट्रायल कोर्ट ने पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की अर्जी खारिज कर दी। हाईकोर्ट के निर्देश पर उक्त अर्जी पर एक नया आदेश पारित किया गया, लेकिन उसे फिर से खारिज कर दिया गया।

इसलिए राज्य सरकार और आवेदक ने इन याचिकाओं के साथ हाईकोर्ट का रुख किया।

आवेदक के वकील ने दलील दी कि आवेदक को इस मामले में राजनीतिक रंजिश के चलते, पूरी तरह से सह-आरोपियों के इकबालिया बयानों के आधार पर घसीटा गया।

यह भी कहा गया कि मुकदमा वापस लेने से विवाद खत्म हो जाएगा, पक्षकारों के बीच सौहार्द बढ़ेगा और न्याय के सर्वोत्तम हित की पूर्ति होगी। राज्य सरकार ने भी मुकदमा वापस लेने का समर्थन किया।

शुरुआत में, बेंच ने CrPC की धारा 321 के प्रावधानों के साथ-साथ इस प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों की जांच करते हुए पाया कि मुकदमा वापस लेने की अनुमति देने के लिए अंतिम मार्गदर्शक विचार हमेशा न्याय प्रशासन का हित ही होना चाहिए।

बंसी लाल बनाम चंदन लाल और शिवनंदन पासवान बनाम बिहार राज्य जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि एक पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को स्वतंत्र रूप से अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए और किसी गलत मकसद से न्याय की सामान्य प्रक्रिया में दखल नहीं देना चाहिए।

बेंच ने पाया कि इस मामले में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद सद्भावनापूर्वक CrPC की धारा 321 के तहत अर्जी दाखिल की थी।

उल्लेखनीय है कि कोर्ट ने पाया कि मुकदमा वापस लेने की राय वास्तव में यूपी राज्य के एडवोकेट जनरल को उपलब्ध कराई गई सामग्री के आधार पर ही दी गई।

कोर्ट ने यह भी पाया कि आवेदक की संलिप्तता केवल सह-आरोपियों के बयानों के आधार पर ही पाई गई।

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए CrPC की धारा 482 के तहत अर्जी, मुकदमा वापस लेने की अर्जी, और साथ ही आपराधिक पुनरीक्षण (Criminal Revision) याचिका स्वीकार की गई।

Case title - Ram Chander Yadav vs. State of U.P. Thru. Prin. Secy. Home Deptt., Lko. and another 2026 LiveLaw (AB) 260

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