सीआरपीसी की धारा 319ः क्या अतिरिक्त आरोपी को मामले में फैसला आने के बाद सह-आरोपी के तौर पर समन जारी हो सकता है?सुप्रीम कोर्ट ने मामले को भेजा बड़ी पीठ के पास

’’ सीआरपीसी की धारा 319 के तहत मिली शक्ति असाधारण प्रकृति की होने के नाते,निचली कोर्ट को किसी आरोेपी को समन जारी करते समय सतर्क रहना चाहिए ताकि जटिलताओं से बचा जा सके और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित हो सके।’’

Update: 2019-05-19 16:51 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 319 की शक्ति की सीमा व परिधि के बारे में तीन सवाल उठाते हुए मामले को बड़ी पीठ के पास रेफर किया है या भेजा है। चूंकि इन सवालों का जवाब संविधान पीठ द्वारा हरदीप सिंह मामले में दिए गए फैसले के बाद भी नहीं मिला है।

जस्टिस एन.वी रमाना व जस्टिस मोहन.एम शांतनागौड़र की पीठ ने इस मामले को बड़ी पीठ के पास निम्नलिखित सवाल भेजे है-
-क्या निचली अदालत के पास अतिरिक्त अभियुक्त को बुलाने के लिए सीआरपीसी की धारा 319 के तहत शक्ति है,जब अन्य सह-अभियुक्तों के संबंध में मुकदमा समाप्त हो गया है और समन का आदेश देने से पहले उसी तारीख को सजा पर फैसला सुनाया गया हो?

-क्या निचली अदालत के पास अतिरिक्त अभियुक्त को बुलाने के लिए सीआरपीसी की धारा 319 के तहत शक्ति है,जब कुछ अन्य फरार अभियुक्त (जिनकी उपस्थिति बाद में सुनिश्चित कर ली गई थी या पेश कर दिया गया था) के मामले की सुनवाई चल रही हो या लंबित हो,जिस कारण मामले की सुनवाई मुख्य सुनवाई से अलग हो जाए?

-वह क्या दिशा-निर्देश है,जिनका एक कोर्ट द्वारा सीआरपीसी की धारा 319 के तहत मिली शक्ति का प्रयोग करते समय पालन करना चाहिए?
सुखपाल सिंह खैरा बनाम पंजाब राज्य केस में जब एनडीपीएस के एक मामले में दस आरोपियों के खिलाफ सुनवाई चल रही थी,तभी अभियोजन पक्ष ने एक अर्जी दायर कर पांच अतिरिक्त आरोपियों को समन जारी करने की मांग की।यह मांग अभियोजन पक्ष के कुछ गवाहों के बयान के आधार पर की गई थी।सेशन कोर्ट ने पहले अपना फैसला सुनाते हुए नौ आरोपियों को दोषी करार दिया और उसके बाद अभियोजन पक्ष की उस अर्जी को स्वीकार कर लिया,जो सीआरपीसी की धारा 319 के तहत दायर की गई थी।पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने समन जारी करने के इस आदेश को चुनौती देने वाली अपील को खारिज कर दिया था।
शीर्ष कोर्ट के समक्ष इस निर्णय को इस आधा पर चुनौती दी गई कि सजा का आदेश देने के बाद समन जारी करने का आदेश 'हरदीप सिंह' मामले में तय किए गए सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से उल्लंघन है।दलील दी गई कि जैसे की केस की सुनवाई पूरी होती है और कोर्ट फैसला सुरक्षित रख लेती है,उसी स्तर पर सीआरपीसी की धारा 319 के तहत मिली शक्तियों को प्रयोग करने का अधिकार समाप्त हो जाता है।
पीठ ने उल्लेख किया कि 'हरदीप सिंह'मामले पर सुनवाई करने वाली पीठ के दो जजों ने इस सवाल को बड़ी बेंच के पास भेज दिया थाः कब सीआरपीसी 1973 की धारा 319 की उपधारा (1) के तहत अतिरिक्त अभियुक्तों को बुलाने की शक्ति का प्रयोग कोर्ट द्वारा किया जा सकता है? क्या कोड की धारा 319 के तहत दायर अर्जी तब तक सुनवाई योग्य नहीं है,जब तक गवाह की जिरह पूरी न हो जाए? लेकिन बड़ी बेंच द्वारा इन सवालों में सुधार किया गया थाः किस स्टेज पर या स्तर पर सीआरपीसी 1973 की धारा 319 के तहत मिली शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है? पीठ ने कहा कि-
''हमने सवाल नंबर-एक के बारे में उस अंतर पर ध्यान दिया है,जो सवाल असल में रेफरेंस के समय भेजा गया था ओर संविधान पीठ ने इसके संबंध में जो अंतिम आदेश दिया है। जो वर्तमान के मामले के संबंध में अंतर बनाता है। रेफरेंस के आदेश में भेजा गया सवाल नंबर-एक उस सवाल की तुलना में व्यापक था,जो सवाल नंबर-एक संविधान की पीठ ने फिर से बनाया था या तैयार किया था। यह एक अत्यंत या मार्जियनल क्षेत्र है,जिसे फिर से एक बड़ी पीठ के पास भेजने की आवश्यकता है।''
उपरोक्त प्रश्नों को बड़ी पीठ के पास भेजते हुए कोर्ट ने कहा कि-
''हालांकि,हमारे विचार हैं कि सीआरपीसी की धारा 319 के तहत मिली शक्ति असाधारण प्रकृति की होने के नाते,निचली कोर्ट को किसी आरोेपी को समन जारी करते समय सतर्क रहना चाहिए ताकि जटिलताओं से बचा जा सके और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित हो सके। हमें खुद को यह याद दिलाना चाहिए कि मामलों का समय पर निपटान करना,न्याय के हित में है।''

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