जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि कानून के साथ टकराव वाले बच्चे (यानी कानून तोड़ने वाले बच्चे) के साथ वयस्क जैसा व्यवहार करना आपराधिक न्याय प्रणाली के सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है। इसमें कई विरोधाभासी बातों के बीच संतुलन बनाना होता है, जैसे अपराध और बचपन के प्रति संवैधानिक प्रतिबद्धता, जनता का गुस्सा और कानूनी सीमाएं, और सजा देने की इच्छा और सुधार की सोच।

उन्होंने कहा कि हालांकि किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015, (JJ Act) कथित अपराध की प्रकृति को कानूनी कार्रवाई तय करने में अहम मानता है - खासकर किशोरों द्वारा किए गए गंभीर अपराधों पर जनता की तीखी बहस को देखते हुए - फिर भी इसके मुख्य उद्देश्य जैसे पुनर्वास, बच्चे का सर्वोत्तम हित, समाज में फिर से शामिल करना और परिवार-आधारित देखभाल, कानूनी ढांचे के केंद्र में बने हुए हैं।

जस्टिस नागरत्ना ने जोर दिया कि किशोर न्याय अधिनियम असल में बच्चे के भविष्य से जुड़ा कानून है। उन्होंने कहा कि किसी बच्चे के जीवन में विधायिका और राज्य का दखल, असल में उस बच्चे के भविष्य में दखल है।

उन्होंने इस सिद्धांत पर जोर दिया,

"जब कोई बच्चा कानून तोड़ता है तो कानून को बच्चे को नहीं तोड़ना चाहिए।"

जस्टिस नागरत्ना 'किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के दस साल: प्रगति, चुनौतियां और अगले दशक के लिए प्राथमिकताएं' पर आयोजित 'राष्ट्रीय वार्षिक हितधारक परामर्श' के उद्घाटन सत्र में बोल रही थीं।

यह परामर्श सुप्रीम कोर्ट की किशोर न्याय समिति द्वारा संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) के सहयोग से आयोजित किया गया।

उन्होंने एक दिलचस्प बात भी बताई कि यह कानून, अन्य बातों के अलावा, संस्थागतकरण (यानी बच्चे को सुधार गृह या संस्था में भेजना) को आखिरी उपाय के तौर पर देखता है। जज ने बताया कि JJ Act दो स्थितियों का विवरण देता है: 'कानून के साथ टकराव वाले बच्चे' और 'देखभाल और संरक्षण की जरूरत वाले बच्चे'। परिस्थितियों के आधार पर किशोर न्याय बोर्ड और बाल कल्याण समिति (CWC) कार्रवाई करते हैं। उन्होंने कहा कि, उदाहरण के लिए, अगर किसी बच्चे को छोड़ दिया गया, उसकी अनदेखी की गई, उसके साथ बुरा बर्ताव या शोषण हुआ और उसे माता-पिता की सही देखभाल नहीं मिल रही है, तो ऐसी स्थिति में CWC (बाल कल्याण समिति) मुख्य संस्था बन जाती है।

उन्होंने कहा,

"कानून का यह हिस्सा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बताता है कि कानून में 'देखभाल और सुरक्षा' का क्या मतलब है। देखभाल का मतलब सिर्फ़ संस्था में रखना नहीं है। वास्तव में, कानून संस्था में रखने को आखिरी उपाय मानता है। प्राथमिकता हमेशा परिवार-आधारित देखभाल और परिवार में वापसी को दी जाती है, बशर्ते यह बच्चे के सर्वोत्तम हित में हो।"

हालांकि इसके अलावा, परिवार-आधारित देखभाल, परिवार में वापसी, स्पॉन्सरशिप, गोद लेने आदि पर ज़ोर पुनर्वास और सामाजिक एकीकरण के ढांचे के तहत ही दिया जाता है। गोद लेना, बच्चे के परिवार के अधिकार को सुरक्षित करने के कानून के नज़रिए का ही एक हिस्सा है। कानून में एक ऐसी प्रक्रिया भी बताई गई, जिसके तहत तय जांच के बाद किसी अनाथ या छोड़े गए बच्चे को गोद लेने के लिए कानूनी रूप से मुक्त घोषित किया जा सकता है।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कानून कागज़ पर तो बहुत स्पष्ट है, लेकिन इसे लागू करने में चुनौतियां आती हैं। उन्होंने इंडिया जस्टिस रिपोर्ट (2025) का हवाला दिया, जिसमें पाया गया कि 31 अक्टूबर 2023 तक 18 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों में JJB (किशोर न्याय बोर्ड) के सामने 55% मामले लंबित हैं। 55,000 से ज़्यादा बच्चे फैसलों का इंतज़ार कर रहे हैं। इस दौरान 363 बोर्ड के सामने आए 1,00,904 मामलों में से केवल 45,097 का निपटारा हुआ। इसके अलावा, 470 में से 111 बोर्ड कानून के मुताबिक प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट और दो सोशल-वर्कर सदस्यों की पूरी बेंच के बिना काम कर रहे हैं।

मामले के निपटारे के दौरान, जस्टिस नागरत्ना ने एक अहम मुद्दा उठाया कि मामला सुलझने के बाद बच्चे का क्या होता है, क्योंकि मामला सुलझने का मतलब यह नहीं है कि बच्चे का पुनर्वास (Rehabilitation) हो गया। इस सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि लंबे समय का डेटा (Longitudinal Data) ज़रूरी है और सुप्रीम कोर्ट की JJ कमिटी को यह डेटा मिल रहा है।

उन्होंने आगे कहा,

"यहीं पर इस साल की बातचीत में लाया जा रहा लंबे समय का डेटा बहुत काम का साबित होता है। 2023 से सुप्रीम कोर्ट की जुवेनाइल जस्टिस कमिटी को राज्यों से सालाना रिपोर्ट मिल रही हैं। साथ ही हाई कोर्ट की जुवेनाइल जस्टिस कमिटियों की देखरेख में बातचीत भी हो रही है। पहली बार, इससे हमें समय के साथ डेटा में बदलाव को देखने का मौका मिल रहा है — ताकि हम प्रगति, लगातार आने वाली रुकावटों और ऐसे तरीकों की पहचान कर सकें जिन्हें दूसरी जगहों पर भी अपनाया जा सकता है। अगले दशक के लिए हमें ठीक इसी तरह के सबूतों की ज़रूरत है।"

अपनी बात खत्म करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने ज़ोर दिया कि कानून के लिए न सिर्फ़ अलग-अलग संस्थाओं को मज़बूत करने की ज़रूरत है, बल्कि उनके बीच तालमेल की भी ज़रूरत है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कानून बच्चे को सिर्फ़ एक फ़ाइल, प्लेसमेंट या आँकड़े के तौर पर नहीं देखता, बल्कि एक ऐसे इंसान के तौर पर देखता है जिसके हालात के हिसाब से अलग-अलग तरह से कदम उठाने की ज़रूरत होती है।

"कोई भी एक संस्था अकेले JJ Act को लागू नहीं कर सकती। बोर्ड अकेले ऐसा नहीं कर सकता। चाइल्ड वेलफेयर कमिटी अकेले ऐसा नहीं कर सकती। न ही न्यायपालिका, पुलिस, कार्यपालिका, कानूनी सेवा संस्थाएँ, सोशल वर्कर, सिविल सोसाइटी संगठन या परिवार अकेले ऐसा कर सकते हैं। सिस्टम तभी काम करता है जब ये सभी हिस्से मिलकर काम करते हैं। इसलिए अगला दशक न सिर्फ़ अलग-अलग संस्थाओं को मज़बूत करने का होना चाहिए, बल्कि उनके बीच के संबंधों को भी मज़बूत करने का होना चाहिए।"

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