सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने आज उस याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति से संबंधित संशोधित मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (MoP) को अंतिम रूप देने में करीब 11 साल की देरी का मुद्दा उठाया गया। यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई।

याचिका में कहा गया कि साल 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम को असंवैधानिक घोषित करने वाले फैसले के बाद पांच जजों की संविधान पीठ ने निर्देश दिया कि मौजूदा MoP में जरूरी बदलाव और सुधार किए जा सकते हैं। इसे भारत सरकार को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) के परामर्श से अंतिम रूप देना था।

संविधान पीठ ने न्यायिक नियुक्तियों के लिए पात्रता मानदंड तय करने, चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने, स्थायी सचिवालय स्थापित करने और जज पद के संभावित उम्मीदवारों के खिलाफ शिकायतों पर विचार करने की व्यवस्था बनाने जैसे अहम क्षेत्रों में सुधार की जरूरत बताई थी।

यह याचिका लोक प्रहरी की ओर से उसके महासचिव और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एसएन शुक्ला ने दाखिल की है। याचिका के अनुसार, केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच कई बार पत्राचार होने के बावजूद संशोधित MoP को करीब 11 साल बाद भी अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है।

मामले की सुनवाई जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध थी। सुनवाई शुरू होते ही जस्टिस नरसिम्हा ने स्पष्ट किया कि वह इस मामले की सुनवाई नहीं कर सकते, क्योंकि NJAC मामले में पांच जजों की संविधान पीठ के समक्ष वह एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के रूप में पेश हुए थे। इसके बाद उन्होंने मामले को उचित आदेश के लिए चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया।

याचिका में आरोप लगाया गया कि संवैधानिक अदालतों में जजों की नियुक्ति के लिए उम्मीदवारों का मूल्यांकन और चयन करने के स्पष्ट तथा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध मानदंड नहीं हैं। इसमें चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी पर भी सवाल उठाया गया। खास तौर पर यह मुद्दा उठाया गया कि कुछ उम्मीदवारों को दूसरों की तुलना में चुने जाने के कारणों को दर्ज नहीं किया जाता।

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और केंद्र सरकार को निश्चित समयसीमा के भीतर एमओपी में संशोधन की प्रक्रिया पूरी कर उसे अंतिम रूप देने का निर्देश देने की मांग की। साथ ही, न्यायिक नियुक्तियों को अधिक वस्तुनिष्ठ, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के उपायों पर विचार करने की मांग भी की गई।

याचिका में एक अहम मांग यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कॉलेजियम की उन बैठकों के कार्यवृत्त को सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत उपलब्ध कराया जाए, जिनमें जजों की नियुक्ति के लिए उम्मीदवारों के चयन पर विचार किया जाता है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि जजों के चयन की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुरूप वस्तुनिष्ठ और सत्यापन योग्य मानदंडों पर आधारित होनी चाहिए। हालांकि, ऐसा करते समय न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहनी चाहिए।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के सामने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल उठाया गया कि क्या देश की सर्वोच्च संवैधानिक अदालतों में जजों की नियुक्ति करने वाली व्यवस्था लगभग 11 साल पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुझाए गए सुधारों के बावजूद अंतिम रूप से तय ढांचे के बिना जारी रह सकती है?

याचिकाकर्ता ने न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा कि जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और योग्यता तथा ईमानदारी पर आधारित होनी चाहिए। इस मामले का कॉलेजियम व्यवस्था के भविष्य, न्यायिक जवाबदेही और न्याय प्रशासन में जनता के भरोसे पर महत्वपूर्ण असर पड़ सकता है।


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