सुप्रीम कोर्ट ने ठग सुकेश चंद्रशेखर को राहत देने से किया इनकार, जज बनकर फोन करने के मामले में सजा पर रोक लगाने की मांग खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने ठग सुकेश चंद्रशेखर की वह याचिका खारिज की, जिसमें उसने अपनी दोषसिद्धि और सजा पर अपील लंबित रहने तक रोक लगाने की मांग की थी। कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया, जिसमें सुकेश को राहत देने से मना किया गया था।
सुकेश को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 170 (लोक सेवक का रूप धारण करना), धारा 189 (लोक सेवक को चोट पहुंचाने की धमकी देना) और धारा 507 (गुमनाम संचार के जरिए आपराधिक धमकी देना) के तहत दोषी ठहराया गया। उस पर सुप्रीम कोर्ट के जज का रूप धारण कर एक न्यायिक अधिकारी पर जमानत देने के लिए दबाव बनाने का आरोप है।
आरोप के मुताबिक, सुकेश ने पहले सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज के निजी सचिव और बाद में खुद जज बनकर न्यायिक अधिकारी को फोन किए, ताकि अपने मामले में अनुकूल आदेश हासिल कर सके। बताया गया कि 2017 के भ्रष्टाचार मामले में पुलिस हिरासत के दौरान उसे उस कांस्टेबल का मोबाइल फोन इस्तेमाल करने का मौका मिला था, जिसकी निगरानी में वह था। इसके बाद उसने उस न्यायिक अधिकारी के आधिकारिक लैंडलाइन और मोबाइल नंबर पर संपर्क किया, जो भ्रष्टाचार के मामले की सुनवाई कर रहे थे।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 20 अगस्त को सुकेश को दोषी ठहराया और 29 अगस्त को सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ उसने एडिशनल सेशंस जज और फिर दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। उसने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के साथ धारा 430(2) के तहत अपनी दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगाने की मांग की थी।
सुकेश की चुनौती मुख्य रूप से ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषसिद्धि दर्ज करते समय उसके आचरण को लेकर की गई कड़ी टिप्पणियों पर केंद्रित थी। हालांकि, दोनों अदालतों ने उसकी याचिका खारिज की। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि इन टिप्पणियों पर विचार अपील की सुनवाई करने वाली अदालत को करना चाहिए, न कि इस स्तर पर।
सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने सुकेश की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट शोएब आलम से पूछा कि वह अपनी दोषसिद्धि पर रोक क्यों चाहता है।
इस पर शोएब आलम ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सुकेश के खिलाफ लंबित 31 आपराधिक मामलों का उल्लेख करते हुए टिप्पणियां की थीं, जबकि उसी अदालत ने यह भी दर्ज किया था कि उन मामलों में उसे दोषी नहीं ठहराया गया। वकील ने दलील दी कि ऐसी टिप्पणियों से दूसरे लंबित मुकदमों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि नए साक्ष्य कानून की धारा 41 के तहत इन टिप्पणियों को उसके खराब चरित्र के साक्ष्य के रूप में देखा जा सकता है और इससे अन्य मामलों की सुनवाई प्रभावित होने की आशंका है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को राहत देने का आधार नहीं माना। खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता के वकील की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री देखने के बाद उसे हाईकोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि नजर नहीं आती, कानून की त्रुटि तो दूर की बात है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सुकेश के खिलाफ अन्य सभी मुकदमों की सुनवाई कानून के अनुसार और अपने-अपने गुण-दोष के आधार पर आगे बढ़नी चाहिए।
गौरतलब है कि ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने की सुकेश की कोशिश पर कड़ी आपत्ति जताई थी। कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि दुनिया में कई बड़े ठग और धोखेबाज हुए हैं, जिन्होंने कारोबारियों, कंपनियों, निवेशकों और आम लोगों को ठगा है। लेकिन न्यायिक कार्यवाही की दिशा बदलने के इरादे से सुकेश द्वारा अपनाया गया तरीका अलग और बेहद गंभीर प्रकृति का है।
ट्रायल कोर्ट ने यह भी कहा था कि कॉलर आईडी में हेरफेर करने, केंद्रीय मंत्रियों का रूप धारण करने और प्रभावशाली लोगों तक पहुंच होने का झूठा दावा कर करोड़पतियों को भरोसे में लेने के बाद सुकेश शायद अपने ही प्रचार का शिकार हो गया। उसे यह खतरनाक भ्रम हो गया कि कोई झूठ जितना बड़ा और जितनी बेखौफी से बोला जाएगा, कानून का शासन उसके सामने झुक जाएगा।
ट्रायल कोर्ट के अनुसार किसी नौकरशाह या राजनीतिक बिचौलिए का रूप धारण करना लालच से जुड़ा अपराध हो सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जज या उनके सचिव का रूप धारण करना संस्थागत व्यवस्था को चुनौती देने जैसा है।