ट्रांसजेंडर अधिकार कानून में संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, केंद्र सरकार से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की एक विवादित व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।
याचिका में संशोधित कानून की उस व्यवस्था को असंवैधानिक बताया गया, जिसके तहत स्वयं की लैंगिक पहचान के आधार पर ट्रांसजेंडर की परिभाषा से कुछ व्यक्तियों को बाहर रखा गया।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा।
अदालत ने इस याचिका को वर्ष 2026 के संशोधन अधिनियम को चुनौती देने वाली पहले से लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ दिया।
यह याचिका कलकत्ता हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले ट्रांसजेंडर वकील ने दायर की। उन्होंने संशोधित अधिनियम की धारा 2(क) के परंतुक को चुनौती दी है। इस प्रावधान में कहा गया है कि भिन्न यौन अभिरुचि और स्वयं की लैंगिक पहचान वाले व्यक्तियों को ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा में शामिल नहीं माना जाएगा।
याचिकाकर्ता ने बताया कि जन्म के समय उन्हें महिला के रूप में दर्ज किया गया, लेकिन बाद में उन्होंने स्वयं को ट्रांस-पुरुष के रूप में पहचाना। वर्ष 2023 में उन्हें ट्रांसजेंडर पहचान पत्र भी जारी किया गया, जिसमें उन्हें थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता दी गई।
याचिका में कहा गया कि 2026 के संशोधन के बाद यह स्थिति उत्पन्न हो गई कि स्वयं की लैंगिक पहचान के आधार पर पहले से मान्यता प्राप्त व्यक्तियों के अधिकार और उनकी कानूनी पहचान पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।
याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया है कि क्या संसद ऐसा कानून बना सकती है, जो सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2014 के ऐतिहासिक फैसले में मान्यता प्राप्त आत्मनिर्णय के अधिकार को सीमित कर दे और पहले से जारी ट्रांसजेंडर पहचान पत्र रखने वाले लोगों की कानूनी पहचान को प्रभावित करे।
याचिका में कहा गया कि सर्वोच्च अदालत ने वर्ष 2014 के अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया कि लैंगिक पहचान व्यक्ति की गरिमा, स्वायत्तता, निजता और स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है तथा प्रत्येक व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान स्वयं निर्धारित करने का अधिकार है।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि वह पश्चिम बंगाल में ट्रांसजेंडर समुदाय के मामलों में सक्रिय रूप से कानूनी सहायता देने वाले चुनिंदा अधिवक्ताओं में शामिल हैं। ऐसे में यदि उनकी कानूनी पहचान प्रभावित होती है तो इसका सीधा असर उनके पेशेवर जीवन, गरिमा और न्याय तक पहुंच पर पड़ेगा।
याचिका में कहा गया कि विवादित संशोधन का सीधा प्रभाव याचिकाकर्ता की पहचान, कानूनी स्थिति और पेशेवर जीवन पर पड़ता है। यह संशोधन उन लोगों को परिभाषा से बाहर करने की ओर संकेत करता है, जिनकी पहचान स्वयं की लैंगिक अनुभूति पर आधारित है। साथ ही, इससे पहले से ट्रांसजेंडर के रूप में पंजीकृत व्यक्तियों के अधिकार और विश्वास भी प्रभावित हो सकते हैं।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से विवादित प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की। वैकल्पिक रूप से उन्होंने अदालत से यह स्पष्ट करने का अनुरोध किया कि यह संशोधन वर्ष 2019 के कानून के तहत पहले से मान्यता प्राप्त ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को प्रभावित नहीं करेगा।
साथ ही, केंद्र सरकार को यह स्पष्ट करने का निर्देश देने की भी मांग की गई कि यह संशोधन पहले से जारी ट्रांसजेंडर पहचान पत्र धारकों पर लागू होगा या नहीं।