सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा के स्पीकर से कहा कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के विधायक सोहनदेब चट्टोपाध्याय द्वारा दायर 10 विधायकों की अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर 8 अक्टूबर 2026 तक फैसला लेने का प्रयास करें। ये याचिकाएं संविधान की दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के तहत कथित दलबदल को लेकर दायर की गई हैं।

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने स्पीकर से अपेक्षा जताते हुए चट्टोपाध्याय की उस याचिका का निपटारा कर दिया, जिसमें अयोग्यता याचिकाओं पर शीघ्र निर्णय की मांग की गई थी।

कपिल सिब्बल ने कहा- अयोग्यता याचिकाओं पर फैसले में देरी का पैटर्न

याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने दलील दी कि अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला लेने में देरी का एक पैटर्न देखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि इस दौरान अलग हुआ गुट खुद को वास्तविक राजनीतिक दल घोषित कराने की स्थिति में पहुंच जाता है।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह स्पीकर से Keisham Meghachandra Singh v. Hon'ble Speaker, Manipur Legislative Assembly मामले में दिए गए सिद्धांत का पालन करने का आग्रह करते हुए याचिका का निपटारा करेगा। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अयोग्यता याचिकाओं पर उचित अवधि, सामान्यतः तीन महीने के भीतर, फैसला किया जाना चाहिए।

8 अक्टूबर को पूरे होंगे तीन महीने

सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड किया कि संबंधित अयोग्यता याचिकाएं 8 जुलाई 2026 को दायर की गई थीं। ऐसे में तीन महीने की अवधि 8 अक्टूबर 2026 को पूरी होगी।

पीठ ने आदेश में कहा कि उसे पूरा विश्वास है कि विधानसभा के स्पीकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों से पूरी तरह अवगत हैं और उक्त अवधि के भीतर उचित निर्णय लेने का हर संभव प्रयास करेंगे।

किन विधायकों के खिलाफ याचिकाएं?

अयोग्यता की मांग जिन विधायकों के खिलाफ की गई है, उनमें—

अरूप रॉय, रितब्रत बनर्जी, फिरहाद हकीम, संदीपन साहा, सेउली साहा, अकरुज्जमान, सबीना यास्मीन, रथिन घोष, बिप्लब मित्रा, जावेद अहमद खान शामिल हैं।

दसवीं अनुसूची के तहत दलबदल का आरोप

याचिकाओं में इन विधायकों के खिलाफ संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा आदेश मुख्य रूप से स्पीकर द्वारा इन याचिकाओं पर निर्णय लेने की समय-सीमा से संबंधित है।

अब स्पीकर को 8 अक्टूबर 2026 तक इन अयोग्यता याचिकाओं पर उचित निर्णय लेने की दिशा में कार्रवाई करनी होगी।

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