सुप्रीम कोर्ट ने चंबल अभयारण्य के कुछ इलाकों को संरक्षित क्षेत्र से हटाने के राजस्थान सरकार के फैसले पर लगाई रोक

Update: 2026-04-03 04:30 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार की उस अधिसूचना पर रोक लगाई, जिसके तहत कोर्ट की पहले से मंज़ूरी लिए बिना राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य के 732 हेक्टेयर इलाके को संरक्षित क्षेत्र से हटा दिया गया था। बेंच ने कहा कि राज्य सरकार "यह फैसला अपने आप नहीं ले सकती थी।"

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन और घड़ियालों समेत संकटग्रस्त जलीय जीवों पर मंडरा रहे खतरे को लेकर खुद से संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए इस मामले की सुनवाई कर रही थी।

इससे पहले बेंच ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश राज्यों के अधिकारियों को राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य क्षेत्र में वन्यजीवों के आवासों को हुए नुकसान के लिए परोक्ष रूप से ज़िम्मेदार ठहराने का इरादा ज़ाहिर किया था। बेंच का मानना ​​था कि अवैध रेत खनन को रोकने में अधिकारियों की "लापरवाही और निष्क्रियता" के कारण यह नुकसान हुआ।

जस्टिस मेहता ने राजस्थान सरकार के हालिया सर्कुलर पर सख्त रुख अपनाया। इस सर्कुलर के ज़रिए 12 ज़िलों के भीतर आने वाले संरक्षित क्षेत्रों को रेत खनन की अनुमति देने के लिए संरक्षित सूची से हटा दिया गया।

कोर्ट ने कहा,

"उन्हें संरक्षित सूची से हटाने के लिए कोर्ट से अनुमति लेनी चाहिए थी; वे यह फैसला अपने आप नहीं ले सकते थे, यह गैर-कानूनी है। राज्य सरकार अब मुश्किल में फंस गई, चंबल के गहरे पानी जैसी मुश्किल में!"

उन्होंने आगे इस बात पर ज़ोर दिया कि इस तरह के अवैध खनन से इस क्षेत्र में हाल ही में दोबारा संरक्षित की गई घड़ियालों की प्रजाति पर खतरा मंडरा रहा है।

आगे कहा गया,

"चाहे कुछ भी हो, हम संरक्षित प्रजातियों के लिए तय किसी भी ज़मीन को संरक्षित सूची से हटाने की अनुमति नहीं देंगे। क्या आपने वह जगह देखी है? क्या आप कभी वहां गए हैं? जाकर देखिए कि वह जगह कितनी नाज़ुक है। बड़ी मुश्किल से घड़ियालों को दोबारा संरक्षित किया जा सका है - वे अब लगभग विलुप्त होने की कगार पर हैं; सिर्फ़ घड़ियाल ही नहीं, बल्कि और भी कई जानवर... यह सब किसके फ़ायदे के लिए हो रहा है? क्या अवैध रेत खनन के लिए?"

इस मामले में 'एमिक्स क्यूरी' (कोर्ट के सलाहकार) सीनियर वकील निखिल गोयल ने बेंच को बताया कि NGT (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) में लंबित एक अन्य मामले में सरकार और वन विभाग के अधिकारियों की एक संयुक्त समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश की थी। इस रिपोर्ट में मध्य प्रदेश और राजस्थान राज्यों के उन सटीक GPS निर्देशांकों (Locations) की जानकारी दी गई, जहां 2022 से लगातार अवैध रेत खनन हो रहा है।

उन्होंने यह भी बताया कि राज्य सरकारों ने अभी तक NGT के सामने इस बात का हलफ़नामा (Affidavit) पेश नहीं किया कि उन्होंने इस संबंध में क्या-क्या कदम उठाए हैं। गोयल ने आगे बताया कि जहां मध्य प्रदेश ने अपने इको-सेंसिटिव ज़ोन (पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र) तय कर लिए हैं, वहीं राजस्थान ने अब तक ऐसा नहीं किया।

जस्टिस मेहता ने अवैध खनन करने वालों द्वारा किए जा रहे परिवहन से जुड़े कुछ वीडियो का ज़िक्र किया:

"कुछ वीडियो तो सचमुच डरावने हैं। उनमें जानवर घूमते दिख रहे हैं, और अर्थमूवर (भारी मशीनें) नदी से रेत निकाल रहे हैं, और पुलिस थानों तथा खनन चौकियों के सामने से गुज़र रहे हैं।"

गोयल ने ज़ोर देकर कहा कि इस इलाके में खनन माफिया का दबदबा बहुत ज़्यादा है और राजस्थान में इस माफिया ने कई SDM, पुलिस अधिकारियों और वन अधिकारियों की हत्या भी की।

जस्टिस मेहता ने आगे कहा कि राज्य सरकारें इस माफिया से निपटने के लिए 'निवारक हिरासत' (Preventive Detention) के प्रावधानों का आसानी से इस्तेमाल कर सकती हैं।

बेंच ने कहा,

"समस्या यह है कि राज्य सरकारें यह पूरी तरह भूल चुकी हैं कि 'निवारक हिरासत' नाम का भी कोई कानून होता है..."

जस्टिस मेहता ने समझाया कि जब जैसलमेर में माफिया का आतंक फैला हुआ था तो एक बार जब 'निवारक हिरासत' का आदेश दिया गया, तो स्थिति काबू में आ गई।

खंडपीठ ने मध्य प्रदेश को इस मामले में अपना हलफनामा दाखिल करने के लिए 4 हफ़्तों का समय दिया। खंडपीठ ने पर्यावरण और वन मंत्रालय के वकील से भी अनुरोध किया कि वे अपने विभाग से निर्देश लेकर अगली सुनवाई में खंडपीठ को जानकारी दें।

खंडपीठ ने कहा,

"इस बीच राजस्थान सरकार द्वारा 23 दिसंबर 2025 को जारी किया गया और 9 मार्च 2026 को अधिसूचित किया गया 'डी-नोटिफिकेशन' (अधिसूचना रद्द करने का आदेश)—जो वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 18 के तहत जारी किया गया था—फिलहाल स्थगित (स्टे) रहेगा।"

अदालत ने NGT (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) के समक्ष लंबित 2022 के अवैध भूमि खनन से जुड़े मामले को भी अपने पास स्थानांतरित कर लिया।

अब इस मामले की सुनवाई 11 मई को होगी।

Case Title: IN RE: ILLEGAL SAND MINING IN THE NATIONAL CHAMBAL SANCTUARY AND THREAT TO ENDANGERED AQUATIC WILDLIFE Versus, SMW(C) No. 2/2026

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