सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (3 नवंबर) को जेलों में जाति आधारित भेदभाव से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले में 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ओर से जानकारी नहीं दिए जाने पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने इन सभी को जवाब दाखिल करने का आखिरी अवसर देते हुए चेतावनी दी कि यदि अगली सुनवाई यानी 13 जनवरी तक जवाब नहीं दिया गया, तो राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों या प्रधान सचिवों को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया जाएगा।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने इन री: भारत की जेलों में भेदभाव मामले की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। इस मामले में सीनियर एडवोकेट (डॉ.) एस. मुरलीधर को न्याय मित्र नियुक्त किया गया है।

यह मामला सुप्रीम कोर्ट के फैसले सुकन्या शांथा बनाम भारत संघ एवं अन्य से जुड़ा है। उस फैसले में जेलों के भीतर जाति आधारित भेदभाव समाप्त करने के लिए निर्देश जारी किए गए। बाद में इन निर्देशों के पालन की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्यवाही शुरू की थी।

इस साल जुलाई में कोर्ट ने विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट रिकॉर्ड पर ली थी। इसमें बताया गया कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से अब तक कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर लिखित जवाब नहीं मिले हैं। इनमें जाति संबंधी आंकड़े एकत्र करने और उन्हें राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) तक भेजने की प्रक्रिया, जेलों के सभी रजिस्टरों और प्रपत्रों से जाति के कॉलम हटाने तथा सफाई के काम को ठेके पर देने से जुड़े सवाल शामिल थे।

इसके अलावा, अर्नेश कुमार और अमानतुल्लाह खान मामलों में जारी दिशानिर्देशों के पालन, प्रत्येक जिले में आगंतुक मंडल (बोर्ड ऑफ विजिटर्स) गठित करने की अधिसूचनाओं, राज्यों द्वारा प्रस्तावित नए कानूनों, नियमों और जेल मैनुअल की स्थिति तथा भेदभावपूर्ण प्रावधानों में संशोधन से जुड़ी जानकारी भी मांगी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से संपर्क कर जल्द से जल्द जानकारी जुटाने का निर्देश दिया था। एमिक्स क्यूरी मुरलीधर ने कोर्ट को यह भी बताया था कि जुलाई में दिए गए निर्देश के बावजूद किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश ने जिला स्तर पर आगंतुक मंडल गठित नहीं किया।

कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को चार सप्ताह के भीतर प्रत्येक जिले में आगंतुक मंडल गठित करने का निर्देश दिया था। इन मंडलों की अध्यक्षता संबंधित जिले के प्रधान जिला जज को करनी थी।

सितंबर में सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस दिशा में कुछ प्रगति पर गौर किया। हालांकि, तब बताया गया कि अलग-अलग राज्यों के केवल कुछ जिलों में ही ऐसे मंडल गठित किए गए।

मंगलवार को सुनवाई के दौरान पीठ ने निर्देशों का पालन नहीं किए जाने को गंभीरता से लिया और राज्यों को अंतिम अवसर दिया। कोर्ट ने कहा कि सभी राज्य केंद्र सरकार की ओर से उठाए गए अलग-अलग सवालों पर तुरंत जवाब दें, ताकि केंद्र सरकार एक समग्र रिपोर्ट दाखिल कर सके।

खंडपीठ ने कहा,

“हम सभी राज्यों को एक आखिरी अवसर देते हैं कि वे केंद्र सरकार की ओर से विभिन्न मुद्दों पर उठाए गए सवालों का तुरंत जवाब दें, ताकि केंद्र सरकार एक समग्र रिपोर्ट दाखिल कर सके। इस रिपोर्ट में यह बताया जाए कि इस कोर्ट के विभिन्न निर्देशों के अनुपालन में अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और इस उद्देश्य को सार्थक रूप से लागू करने के लिए आगे क्या किया जाना बाकी है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया,

“हम आज यह साफ कर रहे हैं कि यदि अगली सुनवाई तक राज्यों ने जवाब नहीं दिया, तो हम सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों या प्रधान सचिवों को व्यक्तिगत रूप से इस कोर्ट में उपस्थित रहने का निर्देश देने के लिए बाध्य होंगे।”

मामले में अगली सुनवाई 13 जनवरी को होगी।


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