सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के उस हालिया आदेश पर रोक लगाने से इनकार किया, जिसमें गुजरात के सोमनाथ मंदिर के 500 मीटर के दायरे में मांसाहारी भोजन पर लगी पाबंदी को बरकरार रखा गया। हालांकि, कोर्ट ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह लंबित अपीलों का निपटारा जल्द से जल्द, संभव हो तो 2 महीने के भीतर कर दे।

यह पाबंदी गिर सोमनाथ के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 10 अगस्त को एक अधिसूचना के जरिए लगाई गई। यह कार्रवाई 'गुजरात पुलिस अधिनियम, 1951' की धारा 33(1)(w)(ii) और धारा 33(6) के तहत की गई। इसके तहत प्रभास पाटन, तालुका, वेरावल के निर्दिष्ट मार्गों और क्षेत्रों में मांसाहारी भोजन और अंडों को तैयार करने, बेचने और रखने पर रोक लगा दी गई। यह पाबंदी मंदिर के 500 मीटर के दायरे में आने वाले सभी इलाकों पर लागू की गई।

इस फैसले को भोजनालयों (जिसमें मौजूदा याचिकाकर्ता, 'ताज रेस्टोरेंट' के मालिक आकिब अमीनभाई खान भी शामिल हैं) ने चुनौती दी। उनका तर्क था कि वे पिछले 35-40 वर्षों से शाकाहारी और मांसाहारी होटल और रेस्टोरेंट चलाने का वैध कारोबार कर रहे हैं।

30 अक्टूबर को सिंगल जज ने जिला मजिस्ट्रेट की 10 अगस्त की अधिसूचना रद्द की। उन्होंने कहा कि यह अधिसूचना 'अनुच्छेद 19(1)(g)' के तहत मिले व्यापार करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करती है, इसलिए यह अधिकार क्षेत्र से बाहर (अल्ट्रा वायर्स) है।

हालांकि, उसी दिन हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच (खंडपीठ) ने सिंगल जज के आदेश पर रोक लगाई। एक अंतरिम उपाय के तौर पर उन्होंने निर्देश दिया कि जब तक मामले की सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक 10 अगस्त की अधिसूचना लागू रहेगी।

एक्टिंग चीफ जस्टिस मानस रंजन पाठक और जस्टिस निर्जर एस. देसाई ने यह आदेश पारित किया। उन्होंने कहा कि चूंकि दीपावली और गुजराती नव वर्ष के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की संभावना है, इसलिए यह पाबंदी लागू रहेगी।

इसके खिलाफ, भोजनालय संचालकों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। ​​

यह मामला जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस पी.बी. वराले की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया। याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट हुज़ेफ़ा अहमदी ने दलील दी कि सिंगल बेंच का यह मानना ​​बिल्कुल सही था कि गुजरात पुलिस अधिनियम के तहत स्थायी प्रतिबंध लगाने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि स्थायी प्रतिबंध लगाना बहुत अजीब बात है।

उन्होंने कहा,

"आप लोगों को कुछ खाने या न खाने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। खान-पान की आदतों को कानून के ज़रिए नियंत्रित नहीं किया जा सकता।"

जस्टिस सुंदेश ने पूछा कि अंतरिम राहत की इतनी जल्दी क्या है?

इस पर अहमदी ने कहा कि रेस्तरां मालिकों के लिए यह दिवाली का समय है और त्योहारों के इस मौसम में उनके कारोबार को नुकसान होगा।

उन्होंने कहा:

"यह दिवाली का समय है, यही उनकी रोज़ी-रोटी है और आप एक पूरे कारोबार को खत्म कर रहे हैं! माई लॉर्ड्स, इस पर रोक (स्टे) लगा दीजिए, मैं 40 सालों से अपना काम चला रहा हूँ! अगर कोई बंद जगह के अंदर मांसाहारी भोजन कर रहा है, तो इसमें गलत क्या है?"

गुजरात राज्य की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रतिबंध का समर्थन करते हुए कहा,

"आप (मांसाहारी भोजन) बाहर परोस सकते हैं।"

दोनों पक्षों की संक्षिप्त दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने आदेश दिया कि हाईकोर्ट को 2 महीने के भीतर इस अपील पर फैसला करने का प्रयास करना चाहिए। सुनवाई खत्म करने से पहले, जस्टिस सुंदेश ने मौखिक रूप से कहा कि शायद इस मामले में एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की ज़रूरत है।

कहा गया,

"शायद, उन्हें कोई बीच का रास्ता निकालना होगा। हम इस पर अभी कुछ नहीं कहना चाहते।"

आदेश पारित करने के बाद जस्टिस सुंदेश ने मौखिक रूप से कहा कि अनुच्छेद 25 की व्याख्या पर 9 जजों की बेंच का आने वाला फैसला इस मुद्दे पर असर डालेगा।

सबरीमाला मामले का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा,

"उम्मीद है कि तब तक अनुच्छेद 25 पर हमारा फैसला भी आ जाएगा, जिसका इस मामले पर काफी असर पड़ेगा। फिर शायद इस तरह की दलीलों की ज़रूरत ही न पड़े।"

Case Title : MS. TAJ RESTAURANT OWNER AAKIB AMINBHAI KHAN Vs STATE OF GUJARAT AND OTHERS

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