'सरकारी कर्मचारी से सरकार के खिलाफ रुख अपनाने की उम्मीद नहीं की जा सकती': आदेश का पालन करने वाले अधिकारी पर लगा 25 लाख का जुर्माना रद्द

Update: 2026-05-17 17:39 GMT

यह देखते हुए कि किसी सरकारी कर्मचारी पर सिर्फ इसलिए निजी जवाबदेही नहीं थोपी जा सकती कि उसने उस समय लागू सरकारी आदेश के अनुसार काम किया, सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की इस बात पर हैरानी जताई है कि उसने अपने कर्मचारी पर राज्य सरकार के आदेश को लागू करने के लिए लगाए गए जुर्माने पर चुप्पी क्यों साधे रखी।

जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच तमिलनाडु के पूर्व कॉलेज शिक्षा निदेशक द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह अपील हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ थी, जिसमें कुल 50 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया, जिसमें से 25 लाख रुपये राज्य सरकार को देने थे और बाकी 25 लाख रुपये अपीलकर्ता से निजी तौर पर वसूल किए जाने थे।

यह विवाद तब शुरू हुआ, जब अपीलकर्ता ने एक निजी महिला कॉलेज में 11 ग्रुप-डी पदों से ज़्यादा भर्ती को मंज़ूरी देने से इनकार किया। यह इनकार 24 अक्टूबर, 2013 के सरकारी आदेश संख्या 219 पर आधारित था, जिसमें भर्ती पर पाबंदियां लगाई गईं। हाईकोर्ट ने कुछ कर्मचारियों को वेतन देने में देरी के लिए अधिकारियों को दोषी ठहराया और अपीलकर्ता को इसके लिए निजी तौर पर ज़िम्मेदार माना था।

हाईकोर्ट द्वारा अधिकारी पर लगाए गए जुर्माने को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट यह समझने में नाकाम रहा कि एक सरकारी कर्मचारी मौजूदा सरकारी नीति के अनुसार काम करने के लिए बाध्य होता है और उससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह खुद सरकार के खिलाफ कोई रुख अपनाए।

कोर्ट ने कहा,

"हमें यह कहना पड़ रहा है कि हाईकोर्ट को इस बात का ध्यान रखना चाहिए था कि किसी सरकारी कर्मचारी को सरकार के खिलाफ कोई रुख अपनाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता..."

बेंच ने कहा कि अधिकारी ने उस समय लागू सरकारी आदेश के अनुसार ही काम किया और उसने मंज़ूरी सिर्फ इसलिए नहीं दी थी क्योंकि उस समय 11 पदों से ज़्यादा भर्ती की अनुमति नहीं थी। राज्य सरकार ने बाद में जो मंज़ूरी दी, वह तब दी गई जब हाई कोर्ट ने संबंधित सरकारी आदेश रद्द किया।

कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा,

"इसलिए हमारी राय में अपीलकर्ता पर कोई भी प्रतिकूल जवाबदेही नहीं थोपी जा सकती और 25,00,000 रुपये का भारी जुर्माना लगाना तो बिल्कुल भी सही नहीं है।"

इसके अलावा, कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि जब हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता पर जुर्माना लगाया, तब राज्य सरकार चुप क्यों रही; जबकि अपीलकर्ता ने राज्य सरकार के आदेश को लागू करने के लिए ही काम किया।

कोर्ट ने कहा,

“हमें हैरानी है कि राज्य सरकार, जो उस समय हाईकोर्ट में अपीलकर्ता थी, जब विवादित आदेश पारित हुआ, उसने चुप और निष्क्रिय रहना क्यों चुना? जबकि एक अधिकारी ने उस दिन कानून के अनुसार ही काम किया। फिर भी राज्य सरकार ने उसका साथ नहीं दिया।”

इसी तर्क को राज्य सरकार पर भी लागू करते हुए कोर्ट ने फैसला दिया कि चूंकि मंज़ूरी मिलने में देरी पिछली सरकारी आदेश के रद्द होने के बाद आई एक नई नीति में बदलाव के कारण हुई, इसलिए राज्य सरकार भी राहत पाने की हकदार है।

नतीजतन, अपील स्वीकार की गई। अपीलकर्ता पर लगाए गए 25 लाख रुपये का भारी जुर्माना रद्द कर दिया गया। साथ ही राज्य सरकार को भी उसकी ज़िम्मेदारी याद दिलाई गई कि वह जनता के खजाने की संरक्षक है। यह भी कहा गया कि आखिरकार, इस तरह के भुगतानों का बोझ बेकसूर करदाताओं पर ही पड़ता है।

Cause Title: C. POORNA CHANDRAN VERSUS THE GOVERNMENT OF TAMIL NADU & ORS.

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