2012 के धर्मस्थल रेप-मर्डर केस में आरोपी बरी, सुप्रीम कोर्ट ने दिया नई जांच का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (21 सितंबर) को कर्नाटक के धर्मस्थल में 17 साल की लड़की के रेप और मर्डर केस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) से नई जांच का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि जिस तरह से लोकल पुलिस, CID और CBI ने जांच की, वह "कोर्ट की अंतरात्मा को झकझोर देने वाला" है।
कोर्ट ने कर्नाटक सरकार को एक SIT बनाने का निर्देश दिया, जिसमें आधुनिक जांच तकनीक की जानकारी रखने वाले कुशल जांच अधिकारी हों और जिसकी अगुवाई राज्य पुलिस का कोई सीनियर अधिकारी करे। खास बात यह है कि बेल्थंगडी पुलिस, कर्नाटक CID या CBI की पिछली जांच से जुड़े किसी भी अधिकारी को नई SIT में शामिल नहीं किया जाएगा।
पीड़िता के पिता की दोबारा जांच की मांग वाली रिट याचिका खारिज करने का हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने राज्य सरकार को एक सीनियर पुलिस अधिकारी की अगुवाई में SIT बनाने का निर्देश दिया, जिसमें आधुनिक जांच तकनीक की जानकारी रखने वाले जांच अधिकारी शामिल हों।
कोर्ट ने कहा,
"एक ऐसे मामले में जहां 17 साल की नाबालिग लड़की का बेरहमी से रेप और मर्डर किया गया हो, जिस तरह से जांच आगे बढ़ी और जिस तरह से अलग-अलग जांच एजेंसियों ने जांच की और सबूत जुटाए व उनका मूल्यांकन किया, वह कोर्ट की अंतरात्मा को झकझोर देता है। जिस व्यक्ति पर मुकदमा चलाया गया, उसे अपराध करने में असमर्थ पाया गया। साफ है कि जांच इस तरह से की गई जिससे पीड़िता के साथ अन्याय हुआ। असली अपराधी (या अपराधियों) द्वारा जांच में हेरफेर करने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसी ढीली और गलत जांच उन जांच अधिकारियों को बढ़ावा देती है, जो अपना काम सही और लगन से करने में नाकाम रहे।"
पीड़िता श्री धर्मस्थल मंजुनाथेश्वर कॉलेज, धर्मस्थल की छात्रा थी। वह 9 अक्टूबर 2012 को कॉलेज के बाद लापता हो गई और आखिरी बार उसे बस स्टॉप के पास देखा गया। अगले दिन झाड़ियों में उसकी लाश मिली; वह अर्धनग्न अवस्था में थी और उसका बायां हाथ कॉलेज के शॉल से पेड़ के तने से बंधा हुआ था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से रेप और गला घोंटकर हत्या किए जाने का पता चला। शुरुआत में यह मामला किसी व्यक्ति के लापता होने का दर्ज किया गया, लेकिन बाद में इसे IPC की धाराओं 376, 302 और 201 के तहत अपराधों में बदल दिया गया।
इस मामले की जांच पहले स्थानीय पुलिस ने की, फिर इसे CID और बाद में CBI को सौंप दिया गया। तीनों जांचों में आखिर में संतोष राव नाम के व्यक्ति को आरोपी बनाया गया, जिस पर रेप और हत्या का आरोप था। हालांकि, सेशंस कोर्ट ने उसे बरी कर दिया, क्योंकि उसे अपराध से जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं मिला।
सेशंस कोर्ट ने जांच में कई कमियां भी बताईं, जैसे पीड़िता के वजाइनल स्वैब को सुरक्षित रखने और उसकी जांच में विफलता, DNA नतीजों का न होना, राव की बीमारी (फिमोसिस) से जुड़े मेडिकल सबूत, CCTV और अन्य सबूतों की ठीक से जांच न होना, टावर-डंप डेटा पर ठीक से कार्रवाई न करना और संबंधित गवाहों से पूछताछ न करना।
इसके बाद पीड़िता के पिता ने कर्नाटक हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर दोबारा जांच की मांग की। उनका आरोप था कि राव को झूठा फंसाया गया और अन्य संदिग्ध लोगों की ठीक से जांच नहीं की गई। उनकी मौत के बाद उनकी पत्नी कुसुमवती गौडा (यानी अपीलकर्ता) ने मामले की कार्यवाही जारी रखी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने माना कि बरी करने के फैसले के बाद "निश्चित रूप से दोबारा जांच की ज़रूरत है", लेकिन उसने ऐसा आदेश देने से इनकार किया। कोर्ट का मानना था कि "गोल्डन आवर" (महत्वपूर्ण शुरुआती समय) के दौरान जो सबूत नहीं जुटाए जा सके, वे अब शायद उपलब्ध न हों।
हाईकोर्ट के आदेश से असंतुष्ट होकर पीड़िता की मां सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं।
जस्टिस सचदेवा द्वारा लिखे गए फैसले में हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया गया और उसके तर्क को गलत बताया गया।
DNA जांच करने वाले विशेषज्ञों की गवाही के आधार पर कोर्ट ने कहा कि अगर संदिग्ध लोग मिल जाते हैं तो पीड़िता के टॉप से लिए गए DNA सैंपल का मिलान अभी भी किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा,
"इस तरह हाईकोर्ट की यह बात कि 'गोल्डन आवर' (घटना के तुरंत बाद का अहम समय) में जो सबूत नहीं मिल पाए, वे अब भी उपलब्ध होंगे या नहीं, इस पर शक है और दोबारा जांच की इजाज़त देने से कोई फ़ायदा नहीं होगा - यह बात साफ़ तौर पर गलत है और इसे माना नहीं जा सकता।"
कोर्ट ने इस मामले में नई जांच का आदेश देने के लिए 'नीतू कुमार नगाइच बनाम राजस्थान राज्य (2020)' के अपने पुराने फ़ैसले का हवाला दिया। कोर्ट ने गौर किया कि मौजूदा मामले में हुई जांच के कारण कोई व्यक्ति कानून की पकड़ से बच निकला था।
कोर्ट ने कहा,
"...जब संवैधानिक कोर्ट को यह यकीन हो जाए कि जांच सही और निष्पक्ष तरीके से नहीं की गई तो न्याय सुनिश्चित करने और सच सामने लाने के लिए किसी स्वतंत्र एजेंसी की मदद से नई जांच पर विचार किया जा सकता है। कोर्ट ने माना कि नई जांच का आदेश देने की शक्ति का इस्तेमाल तब किया जा सकता है, जब कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचे कि जांच इस तरह से की गई, जिससे कोई व्यक्ति कानून की पकड़ से बच सके। ऐसे खास हालात में आपराधिक न्याय व्यवस्था में गड़बड़ी को रोकने के लिए कोर्ट 'डी नोवो' (शुरू से) जांच का आदेश दे सकता है।"
इस प्रकार, कोर्ट ने मामले में SIT (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम) द्वारा 'डी नोवो' यानी शुरू से जांच का आदेश दिया। साथ ही कोर्ट ने "केंद्र और राज्य सरकारों और अन्य अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे ऐसी विशेष रूप से गठित जांच टीम को पूरी ज़रूरी मदद दें ताकि असली दोषियों को पकड़ा जा सके और मुक़दमा प्रभावी ढंग से चलाया जा सके।"
कोर्ट ने आदेश दिया,
"...बेल्थांगडी पुलिस स्टेशन, CID या CBI की उन जांच टीमों का कोई भी अधिकारी, जो पहले की जांच से जुड़ा था, स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम का हिस्सा नहीं होगा... नई जांच तीन महीने के भीतर पूरी की जाएगी और पुलिस रिपोर्ट कानून के अनुसार संबंधित कोर्ट में दाखिल की जाएगी, जिसके बाद मामले की कार्यवाही कानून के अनुसार आगे बढ़ेगी।"
कोर्ट ने यह भी माना कि संतोष राव पर पहले ही मुक़दमा चल चुका है और उन्हें बरी किया जा चुका है, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 20(2) और CrPC की धारा 300 के तहत उन्हें दोबारा मुक़दमे से सुरक्षा प्राप्त है। इसलिए, इस मामले में उन पर आगे कोई जांच या मुक़दमा नहीं चलाया जाएगा।
अपील का निपटारा कर दिया गया।
Cause Title: Kusumavati Gowda Vs. The Government of Karnataka & Ors.