सुप्रीम कोर्ट ने केरल में कोर्ट फीस में भारी बढ़ोतरी को चुनौती देने वाली केरल हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (KHCAA) की याचिका पर नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने फिलहाल उस सीमित मुद्दे पर विचार करने का निर्णय लिया है कि मुकदमे के मूल्य के आधार पर लगाई जाने वाली (Ad Valorem) कोर्ट फीस पर अधिकतम सीमा तय किए बिना उसे लागू करना वैध है या नहीं।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ केरल फाइनेंस एक्ट, 2025 के जरिए केरल कोर्ट फीस एंड सूट्स वैल्यूएशन एक्ट, 1959 में किए गए संशोधनों को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

एसोसिएशन की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट के. परमेश्वर ने दलील दी कि यदि कोर्ट फीस पर कोई अधिकतम सीमा नहीं है, तो यह वैध शुल्क के बजाय टैक्स का स्वरूप ले सकती है। उन्होंने कहा कि कोर्ट फीस का न्यायिक प्रशासन पर होने वाले खर्च और अदालतों द्वारा विवादों के निपटारे में लगाए जाने वाले समय से उचित संबंध होना चाहिए।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि वहां भी एड वैलोरेम कोर्ट फीस के लिए अधिकतम सीमा निर्धारित है। एसोसिएशन ने यह भी चिंता जताई कि बढ़ी हुई फीस का असर मुआवजे से जुड़े मामलों, खासकर मृत्यु और मोटर दुर्घटना दावों पर पड़ सकता है।

'व्यावसायिक विवादों में न्यायिक समय की कीमत होनी चाहिए': जस्टिस बागची

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने टिप्पणी की कि व्यावसायिक विवादों में लगने वाले न्यायिक समय की कीमत होनी चाहिए। उन्होंने कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यावसायिक मुकदमों में कोर्ट फीस का संबंध विवाद के मूल्य और न्यायिक समय से होना चाहिए।

वहीं, CJI सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि क्या उन्होंने अन्य राज्यों में लागू कोर्ट फीस की तुलना दर्शाने वाला कोई चार्ट पेश किया है। उन्होंने न्यायिक प्रशासन पर होने वाले खर्च और कोर्ट फीस से प्राप्त राजस्व के बीच के अंतर की जानकारी भी मांगी।

राज्य सरकार को कोर्ट फीस से मिली छूट पर CJI ने टिप्पणी की, “दायां हाथ बाएं हाथ को भुगतान करेगा।”

हालांकि, पीठ ने फिलहाल केवल बिना अधिकतम सीमा वाली एड वैलोरेम कोर्ट फीस की वैधता के मुद्दे पर नोटिस जारी किया है।

कोर्ट फीस में 9,900% तक बढ़ोतरी को चुनौती

एसोसिएशन ने केरल फाइनेंस एक्ट, 2025 के जरिए किए गए संशोधनों को चुनौती देते हुए दावा किया है कि कुछ श्रेणियों में कोर्ट फीस लगभग 400% से लेकर करीब 9,900% तक बढ़ाई गई है। याचिका के अनुसार, इससे मुकदमेबाजों पर अनुचित आर्थिक बोझ पड़ेगा और संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 21 के तहत मिले अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

एसोसिएशन ने उदाहरण देते हुए बताया कि केरल हाईकोर्ट में रिट अपील की फीस ₹200 से बढ़ाकर ₹1,000 और रिट याचिका की फीस ₹100 से बढ़ाकर ₹500 कर दी गई है। वहीं, अग्रिम जमानत याचिका की फीस ₹10 से बढ़ाकर ₹500 किए जाने का भी उल्लेख किया गया है।

एसोसिएशन का तर्क है कि राज्य ने फीस में बढ़ोतरी और न्यायिक प्रशासन पर होने वाले वास्तविक खर्च के बीच उचित संबंध स्थापित नहीं किया है। उसका कहना है कि अत्यधिक फीस न्याय तक पहुंच को बाधित कर सकती है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो मुआवजे या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में अदालत का रुख करते हैं।

राज्य सरकार को कोर्ट फीस से छूट देने को भी चुनौती

एसोसिएशन ने केरल कोर्ट फीस एंड सूट्स वैल्यूएशन एक्ट की धारा 73A को भी चुनौती दी है, जिसके तहत राज्य सरकार और उसके अधिकारियों को कोर्ट फीस से छूट दी गई है।

याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकार केरल में प्रमुख मुकदमेबाजों में से एक है, लेकिन उसे फीस से छूट मिलने और अन्य पक्षकारों पर फीस का बोझ पड़ने से असमान व्यवस्था पैदा होती है। एसोसिएशन ने केंद्र सरकार को ऐसी ही छूट नहीं दिए जाने पर भी सवाल उठाया है।

केरल हाईकोर्ट ने पहले संशोधनों को बरकरार रखा था

केरल हाईकोर्ट ने 31 अक्टूबर, 2025 को एसोसिएशन की जनहित याचिका खारिज करते हुए कोर्ट फीस में संशोधन को बरकरार रखा था। हाईकोर्ट ने कहा था कि महंगाई, रुपये के मूल्य में गिरावट और न्यायिक प्रशासन पर बढ़ते खर्च को देखते हुए राज्य को फीस संशोधित करने का अधिकार है।

राज्य सरकार ने दलील दी थी कि दो दशक से अधिक समय तक निश्चित कोर्ट फीस में संशोधन नहीं किया गया था। हाईकोर्ट ने यह भी माना था कि कोर्ट फीस से होने वाली आय और न्यायिक प्रशासन पर होने वाले खर्च के बीच व्यापक संबंध पर्याप्त है; इसके लिए गणितीय सटीकता आवश्यक नहीं है।

अब सुप्रीम कोर्ट इस सीमित सवाल पर विचार करेगा कि बिना अधिकतम सीमा वाली एड वैलोरेम कोर्ट फीस वैध है या नहीं।

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