कुंभ के दौरान हवाई किराए शोषणकारी थे, हम हस्तक्षेप करेंगे: त्योहारों में एयरफेयर बढ़ोतरी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

Update: 2026-01-20 11:56 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने त्योहारों और विशेष आयोजनों के दौरान हवाई टिकटों के दामों में अचानक और अत्यधिक बढ़ोतरी पर गंभीर चिंता जताई है।

कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिए कि यदि यह बढ़ोतरी शोषणकारी पाई गई तो वह इस मामले में हस्तक्षेप करेगा और आवश्यक निर्देश जारी करेगा।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसे सोशल एक्टिविस्ट एस. लक्ष्मीनारायणन ने दायर किया।

याचिका में भारत के नागरिक उड्डयन क्षेत्र में एयरफेयर निर्धारण और अतिरिक्त शुल्कों पर नियामक नियंत्रण की मांग की गई। इसमें एल्गोरिदम आधारित डायनेमिक प्राइसिंग, यात्रा के दिन लगाए जाने वाले सरचार्ज और मुफ्त चेक-इन बैगेज सीमा को 25 किलोग्राम से घटाकर 15 किलोग्राम किए जाने को चुनौती दी गई।

सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अनिल कौशिक से कहा कि कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप करेगा।

उन्होंने कुंभ मेले के दौरान हवाई किरायों में हुई भारी बढ़ोतरी का हवाला देते हुए कहा कि प्रयागराज और जोधपुर जैसे शहरों में किराए सामान्य से तीन गुना तक बढ़ गए।

इस पर जस्टिस विक्रम नाथ ने टिप्पणी की कि यह समस्या केवल कुंभ तक सीमित नहीं है, बल्कि हर त्योहार के दौरान यही स्थिति देखने को मिलती है।

हल्के-फुल्के अंदाज में जस्टिस मेहता ने यह भी कहा कि सॉलिसिटर जनरल अहमदाबाद में किराए नियंत्रित रखने का ध्यान रखते हैं, लेकिन अन्य जगहों की समस्याओं पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता।

याचिका में कहा गया कि एल्गोरिदम आधारित डायनेमिक प्राइसिंग के कारण टिकटों के दाम कुछ ही घंटों में दोगुने या तिगुने हो जाते हैं। इसमें महाकुंभ यात्रा और पहलगाम आतंकी घटना के बाद हवाई किरायों में आई अचानक वृद्धि का हवाला दिया गया।

याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसी मूल्य अस्थिरता उन यात्रियों को सबसे अधिक प्रभावित करती है, जो पहले से यात्रा की योजना नहीं बना सकते, जैसे मेडिकल इमरजेंसी, प्राकृतिक आपदा या पारिवारिक संकट की स्थिति में यात्रा करने वाले लोग।

याचिका में तर्क दिया गया कि अल्प सूचना पर किराए कई गुना बढ़ाने की अनुमति देना आर्थिक रूप से कमजोर और संवेदनशील यात्रियों के सुरक्षित और समयबद्ध आवागमन के अधिकार को व्यावहारिक रूप से समाप्त कर देता है। इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन बताया गया।

इसके साथ ही याचिका में यह भी रेखांकित किया गया कि देश की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण हवाई यात्रा कई क्षेत्रों में एक आवश्यक साधन बन चुकी है, विशेष रूप से पूर्वोत्तर राज्यों, अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह और उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में, जहां सड़क या रेल यात्रा व्यावहारिक नहीं है।

इस आधार पर कहा गया कि हवाई परिवहन एक आवश्यक सेवा है और आवश्यक सेवा अनुरक्षण अधिनियम, 1981 के तहत राज्य का दायित्व है कि ऐसी सेवाएं किफायती और गैर-शोषणकारी बनी रहें।

याचिका में यह भी कहा गया कि रेलवे, बिजली और डाक जैसी अन्य सेवाओं में किराए और शुल्क विनियमित होते हैं, जबकि एयरलाइंस एक ही दिन में कई बार किराए बदल सकती हैं, वह भी बिना किसी पारदर्शी व्यवस्था या पूर्व अनुमोदन के।

इसके अलावा, अतिरिक्त बैगेज शुल्क में कथित ओवरचार्जिंग और ऐसे मामलों में जवाबदेही की कमी का भी उल्लेख किया गया।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि त्योहारों और आपात स्थितियों में हवाई किरायों की बेकाबू बढ़ोतरी अब गंभीर न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकती है।

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