जजों की नियुक्ति से लेकर अदालतों में बढ़ते लंबित मामलों तक न्याय व्यवस्था की कई अहम चुनौतियों पर हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस और सीनियर एडवोकेट डॉ. एस. मुरलीधर ने गंभीर सवाल उठाए।

उन्होंने कहा कि पिछले 12 वर्षों में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया में कार्यपालिका का ऐसा दखल देखने को मिला है, जिसका कोई स्पष्ट कारण सामने नहीं आया। उन्होंने कॉलेजियम व्यवस्था की पारदर्शिता और उसके काम करने के तरीके पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि नियुक्तियों के मानदंड स्पष्ट नहीं हैं और पूरी प्रक्रिया में काफी अक्षमता है।

28वें डी.एस. बोरकर स्मृति व्याख्यान में भारत 2047 के दृष्टिकोण पर बोलते हुए मुरलीधर ने कहा कि 1993 में कॉलेजियम व्यवस्था लागू होने के बाद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति में चीफ जस्टिस की राय को प्राथमिकता दी गई। इसके बावजूद यह व्यवस्था अब तक ऐसे उम्मीदवारों को चुनने में पूरी तरह सफल नहीं रही है जो न्यायपालिका के लिए सबसे बेहतर हों।

उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया में न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों की भूमिका होती है। ऐसे में पिछले 12 वर्षों के दौरान कार्यपालिका की ओर से हुआ हस्तक्षेप चिंता का विषय है।

मुरलीधर ने नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर कहा कि इसमें मानदंडों की अस्पष्टता, पारदर्शिता की कमी और समग्र रूप से अक्षमता बनी हुई है।

मुरलीधर ने जजों के खाली पदों को लेकर भी कॉलेजियम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया।

उन्होंने कहा कि किसी जज कीरिटारमेंट की तारीख पहले से पता होती है और सार्वजनिक भी रहती है। इसके बावजूद उनकी जगह नए जज की नियुक्ति समय रहते नहीं हो पाती। उनके मुताबिक सरकार अगर हाईकोर्ट और दूसरी अदालतों में जजों के स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ा भी दे लेकिन नियुक्ति प्रक्रिया को तेज और प्रभावी नहीं बनाया गया तो इससे समस्या कम होने के बजाय और बढ़ सकती है। खाली पदों की संख्या बढ़ने का सीधा असर मामलों के निपटारे पर पड़ेगा।

अदालतों में लंबित मामलों और लगातार बढ़ते मुकदमों पर मुरलीधर ने कहा कि जजों के काम को लेकर एक गलत धारणा बनी हुई है।

उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि बड़ी संख्या में जज अपनी क्षमता के मुताबिक लंबित मामलों को निपटाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।

उन्होंने माना कि कुछ जज काम से बचते हैं लेकिन ऐसे जज भी हैं जो बेहद मेहनत करते हैं और अदालतों के भारी काम का बोझ संभाल रहे हैं।

मुरलीधर के अनुसार, सभी स्तर की अदालतों में करीब 20 से 30 प्रतिशत जज समय के पाबंद, जिम्मेदार, मेहनती और मामलों के प्रबंधन में प्रभावी हैं। उनके मुताबिक चिंता उन जजों को लेकर होनी चाहिए जो इस स्तर पर काम नहीं कर रहे हैं।

मुरलीधर ने कहा कि अदालतों में लंबित मामलों की पूरी तस्वीर देखने के लिए यह समझना जरूरी है कि नए मामले कितनी तेजी से दाखिल हो रहे हैं।

उन्होंने बताया कि जिला स्तर की अदालतों में हर महीने करीब 29 लाख मामले दाखिल होते हैं, जबकि करीब 24 लाख मामलों का निपटारा किया जाता है। यानी अदालतें बड़ी संख्या में मामलों का निपटारा कर रही हैं लेकिन नए मामलों की संख्या उससे अधिक होने के कारण लंबित मामलों का दबाव बना रहता है।

हाईकोर्ट में हर साल 10 लाख से अधिक मामले दाखिल होते हैं और लगभग इतनी ही संख्या में मामलों का निपटारा भी होता है। ऐसे में कुल लंबित मामलों में अपेक्षित कमी नहीं आ पाती। सुप्रीम कोर्ट का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वहां फिलहाल करीब 93 हजार मामले लंबित हैं। वर्ष 2025 में करीब 62 हजार मामले दाखिल हुए जबकि लगभग 57 हजार मामलों का निपटारा किया गया।

मुरलीधर ने अदालतों में बढ़ते मुकदमों के लिए सिर्फ न्यायपालिका को जिम्मेदार मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों के फैसलों का भी अदालतों के कामकाज पर सीधा असर पड़ता है।

उनके मुताबिक सरकारों के मनमाने फैसले, किसी मुद्दे पर निर्णय नहीं लेना और लोकतंत्र में सामान्य गतिविधियों को अपराध बना देना लोगों को अदालतों का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर करता है।

उन्होंने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को अपराध की तरह देखे जाने और अनावश्यक गिरफ्तारियों का उदाहरण देते हुए कहा कि इस तरह की सरकारी कार्रवाइयां मुकदमों की संख्या बढ़ाती हैं।

मुरलीधर ने कहा कि अदालतों में देरी, मुकदमों का खर्च और अनिश्चितता के बावजूद लोग बड़ी संख्या में अदालतों का रुख कर रहे हैं। इसका एक कारण सरकारों की ऐसी कार्रवाइयां भी हैं, जिनके खिलाफ लोगों को न्यायिक राहत मांगनी पड़ती है।

उन्होंने सरकार की मुकदमेबाजी की नीति पर भी कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि सरकार किसी मामले में हारने के बाद अक्सर उस फैसले को चुनौती देती है और मामला एक अदालत से दूसरी अदालत होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाता है।

उन्होंने कहा कि मामला किसी सरकारी विभाग के माली को 100 रुपये की वेतन वृद्धि देने का हो या किसी मृत सरकारी कर्मचारी की विधवा को 300 रुपये की पेंशन देने का, सरकार कई बार ऐसे मामलों में भी अपील करती रहती है।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति के अदालत में जीतने के बाद भी यह सुनिश्चित नहीं होता कि सरकार अदालत के आदेश को स्वीकार कर उसका पालन करेगी। इससे मुकदमेबाजी लंबी होती जाती है और अदालतों पर मामलों का बोझ बढ़ता है।

मुरलीधर ने कहा कि सरकार की मुकदमेबाजी की क्षमता इतनी बड़ी है कि वह सबसे बड़े निजी कारोबारी समूह से भी अधिक मुकदमे लड़ सकती है। इसका सीधा असर न्याय व्यवस्था पर पड़ता है।

मामलों में देरी के लिए मुरलीधर ने सरकारी वकीलों की कार्यप्रणाली को भी जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि कई बार सरकारी वकीलों की नियुक्ति मामले की जरूरत और उनकी विशेषज्ञता के आधार पर नहीं होती। इसके कारण सुनवाई के दौरान वकील उपलब्ध नहीं होते और बार-बार तारीख लेनी पड़ती है।

उन्होंने कहा कि कई मामलों में सरकारी वकील अदालत में पहुंचते भी हैं तो उनके पास मामले से जुड़े पर्याप्त निर्देश नहीं होते। जवाबी हलफनामे समय पर दाखिल नहीं किए जाते और जरूरी रिकॉर्ड भी तय समय के भीतर अदालत के सामने पेश नहीं किए जाते।

मुरलीधर के मुताबिक इस स्थिति से अदालतों के जज भी परेशान होते हैं लेकिन सरकार के वकील की भागीदारी के बिना कई मामलों में आगे की सुनवाई संभव नहीं होती। ऐसे में जजों को मजबूरी में सरकारी वकील की ओर से मांगी गई तारीख स्वीकार करनी पड़ती है।

मुरलीधर की टिप्पणी का मूल संदेश यही रहा कि अदालतों में लंबित मामलों और न्याय मिलने में देरी के लिए केवल जजों को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। जजों की नियुक्ति में देरी, खाली पद, सरकारों की मुकदमेबाजी की नीति, समय पर जवाब और रिकॉर्ड दाखिल न करना तथा बार-बार तारीख मांगना इन सभी का असर न्याय व्यवस्था पर पड़ता है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि न्यायपालिका को मजबूत करने के लिए केवल जजों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी और समयबद्ध बनाना, सरकार की मुकदमेबाजी की नीति में बदलाव करना और अदालतों में सरकारी पक्ष की तैयारी बेहतर करना भी जरूरी है। तभी बढ़ते मुकदमों और लंबित मामलों के दबाव को वास्तविक रूप से कम किया जा सकेगा।

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