अनुच्छेद 226 के तहत ED रिट याचिका दायर कर सकती है या नहीं, केरल और तमिलनाडु की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (20 जनवरी) को केरल और तमिलनाडु राज्यों द्वारा दायर याचिकाओं पर नोटिस जारी किया, जिनमें यह अहम संवैधानिक सवाल उठाया गया कि क्या प्रवर्तन निदेशालय (ED) को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करने का अधिकार है।
कोर्ट ने चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए। हालांकि किसी प्रकार की अंतरिम रोक नहीं लगाई गई।
यह मामला जस्टिस दिपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया। केरल राज्य की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल पेश हुए, जबकि तमिलनाडु राज्य की ओर से अन्य एडवोकेट ने पक्ष रखा।
सुनवाई की शुरुआत में जस्टिस शर्मा ने टिप्पणी की कि केरल हाइकोर्ट का आदेश अंतरिम प्रकृति का है।
इस पर कपिल सिब्बल ने कहा कि केरल राज्य के संदर्भ में यह आदेश अंतिम प्रभाव वाला है। उन्होंने दलील दी कि इस आदेश के चलते अब सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना होगा कि क्या ED विभाग को अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार का सहारा लेने की वैधानिक क्षमता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर अनुच्छेद 131 और 226 के आपसी संबंध पर भी विचार आवश्यक है।
केरल राज्य ने 26 सितंबर, 2025 के उस आदेश को चुनौती दी है जो केरल हाइकोर्ट की खंडपीठ द्वारा पारित किया गया। इस आदेश में हाइकोर्ट ने एकल पीठ के उस अंतरिम आदेश को बरकरार रखा था, जिसके तहत राज्य सरकार द्वारा गठित जांच आयोग की कार्यवाही पर रोक लगा दी गई।
यह जांच आयोग इस बात की पड़ताल के लिए गठित किया गया कि क्या ED और अन्य केंद्रीय एजेंसियां राज्य के राजनीतिक नेताओं, जिनमें मुख्यमंत्री पिनराई विजयन भी शामिल हैं, को सोना तस्करी मामले में झूठे तौर पर फंसा रही हैं।
सोना तस्करी मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 6 जुलाई, 2020 का है, जब तिरुवनंतपुरम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर करीब 30 किलोग्राम सोना बरामद किया गया, जिसकी कीमत लगभग 14.82 करोड़ रुपये बताई गई। यह सोना कथित तौर पर 'डिप्लोमैटिक बैगेज' के रूप में संयुक्त अरब अमीरात के वाणिज्य दूतावास को भेजा गया।
जांच के दौरान गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम 1967 और धनशोधन निवारण अधिनियम, 2002 के तहत अपराध सामने आए।
इसके बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी और ईडी ने भी अलग-अलग मामले दर्ज किए। इस केस के मुख्य आरोपियों में स्वप्ना सुरेश और संदीप नायर शामिल हैं, जिनके बारे में आरोप है कि उनसे ED द्वारा दबाव में बयान दिलवाकर मुख्यमंत्री के खिलाफ आरोप लगाए गए।
इसी पृष्ठभूमि में ED ने राज्य सरकार द्वारा गठित जांच आयोग की अधिसूचना को चुनौती देते हुए केरल हाइकोर्ट में रिट याचिका दायर की थी। यह आयोग पूर्व हाइकोर्ट जस्टिस वी.के. मोहनन की अध्यक्षता में गठित किया गया था।
हाइकोर्ट का दृष्टिकोण
केरल सरकार ने यह तर्क दिया कि ED केंद्र सरकार का केवल एक विभाग है और उसे अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करने का अधिकार नहीं है।
हालांकि, केरल हाइकोर्ट की एकल पीठ ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि ED एक वैधानिक संस्था है। इसलिए उसे रिट क्षेत्राधिकार का सहारा लेने का अधिकार प्राप्त है।
हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि प्रवर्तन निदेशालय के उप निदेशक धनशोधन निवारण अधिनियम के तहत वैधानिक प्राधिकारी हैं। इस हैसियत से वे भी रिट याचिका दायर करने के लिए सक्षम हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार करेगा कि क्या प्रवर्तन निदेशालय जैसी केंद्रीय जांच एजेंसी को अनुच्छेद 226 के तहत सीधे रिट याचिका दायर करने का अधिकार है या नहीं।