मंदिर ट्रस्ट उद्योग नहीं: सुप्रीम कोर्ट, बर्खास्त अकाउंटेंट को 12 लाख रुपये मुआवजा

Update: 2026-02-03 09:41 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने हालिया फैसले में स्पष्ट किया कि कोई मंदिर ट्रस्ट औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत “उद्योग” की श्रेणी में नहीं आता।

इसी आधार पर कोर्ट ने एक मंदिर ट्रस्ट में कार्यरत अकाउंटेंट की सेवा समाप्ति को वैध ठहराया हालांकि न्याय के हित में उसे एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश भी दिया।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने कहा,

“प्रतिवादी ट्रस्ट एक मंदिर है। इस कारण यह 'उद्योग' की परिभाषा के चारों कोनों के भीतर नहीं आता।”

मामले में अपीलकर्ता को वर्ष 1977 में लक्ष्मीनारायण देव ट्रस्ट में अकाउंटेंट के पद पर नियुक्त किया गया। उन्होंने लगातार 12 वर्षों तक सेवा दी लेकिन 1 नवंबर, 1999 को बिना किसी विभागीय जांच के कथित रूप से मौखिक रूप से उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। पुनर्नियुक्ति के लिए की गई उनकी प्रस्तुतियों पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई, जिसके बाद उन्होंने श्रम सुलह अधिकारी का रुख किया।

सुलह की कार्यवाही के दौरान ट्रस्ट ने उन्हें वडताल स्थानांतरण पर रिपोर्ट करने को कहा और ऐसा न करने पर सेवा समाप्ति की चेतावनी दी। अंततः विवाद श्रम न्यायालय तक पहुंचा।

3 दिसंबर 2009 को श्रम न्यायालय ने यह कहते हुए संदर्भ को खारिज कर दिया कि संबंधित ट्रस्ट एक मंदिर और धार्मिक-धार्मिक संस्था है, जो औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2(ज) के तहत उद्योग नहीं है।

कोर्ट ने माना कि ट्रस्ट न तो कोई उत्पादन गतिविधि करता है और न ही लाभ कमाने वाला संस्थान है।

इस निर्णय को गुजरात हाइकोर्ट के सिंगल जज और बाद में खंडपीठ ने भी बरकरार रखा, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए अपील खारिज की और कहा कि मंदिर ट्रस्ट को औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत उद्योग नहीं माना जा सकता।

हालांकि कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि अपीलकर्ता ने 12 वर्षों तक बिना किसी दाग के लगातार सेवा दी थी और उनकी सेवा बिना किसी जांच के समाप्त की गई। इसे देखते हुए कोर्ट ने न्यायसंगत समाधान के तौर पर एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा,

“हमारा विचार है कि इस पूरे विवाद का न्यायोचित समाधान यह होगा कि प्रतिवादी ट्रस्ट अपीलकर्ता को 12 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा दे क्योंकि उसने 12 वर्षों तक निरंतर, निर्बाध और निष्कलंक सेवा दी है।”

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि ट्रस्ट चार सप्ताह के भीतर 12 लाख रुपये की राशि पूर्ण और अंतिम निपटान के रूप में अदा करे। ऐसा न करने पर इस राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देय होगा।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भुगतान न होने की स्थिति में अपीलकर्ता श्रम न्यायालय में निष्पादन याचिका या औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 33(सी)(2) के तहत आवेदन दायर कर राशि की वसूली कर सकता है।

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