लखनऊ कोचिंग सेंटर अग्निकांड पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, LDA उपाध्यक्ष को अवमानना नोटिस

Update: 2026-08-06 09:58 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने जून में लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर में हुई भीषण आग की घटना, जिसमें 15 छात्रों की मौत हो गई थी, पर गंभीर रुख अपनाते हुए लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के उपाध्यक्ष को अवमानना नोटिस जारी किया।

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के उन पूर्व निर्देशों के कथित उल्लंघन पर की, जिनमें आवासीय भवनों का व्यावसायिक उपयोग किए जाने की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई करने को कहा गया था।

सुनवाई के दौरान एमिकस क्युरी सीनियर एडवोकेट अजीत कुमार सिन्हा ने अदालत को बताया कि जिस भवन में यह हादसा हुआ, उसके खिलाफ 10 मई 2016 को ध्वस्तीकरण का आदेश पारित किया गया था। हालांकि, उसी प्राधिकरण ने 5 जुलाई 2016 को तकनीकी आधार पर अपना ही आदेश वापस ले लिया और इसके बाद वर्षों तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।

अदालत को बताया गया कि इसके बावजूद उस आवासीय भवन का उपयोग लगातार व्यावसायिक और शैक्षणिक गतिविधियों के लिए होता रहा, जिसके परिणामस्वरूप हालिया अग्निकांड में 15 छात्रों की जान चली गई।

इन तथ्यों पर गंभीर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घटनाक्रम से नगर नियोजन नियमों के पालन और अधिकारियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

अदालत ने कहा,

"एमिकस क्यूरी ने बताया कि हाल की त्रासदी में 15 छात्रों की जान चली गई। यह भी बताया गया कि वर्ष 2016 में ध्वस्तीकरण का आदेश पारित किया गया, लेकिन बाद में उसी प्राधिकरण ने तकनीकी आधार पर उसे वापस ले लिया और उसके बाद हादसे तक कोई कार्रवाई नहीं की गई।"

पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि मास्टर प्लान के तहत निर्धारित भूमि उपयोग का खुलेआम उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। इसलिए अदालत अवमानना कार्यवाही शुरू करने के लिए विवश है।

अदालत ने आदेश दिया,

"लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह बताएं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन न करने पर उनके विरुद्ध उचित कार्रवाई क्यों न की जाए।"

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि हादसे के बाद गठित विशेष जांच दल (SIT) की रिपोर्ट अगली सुनवाई पर सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जाए।

यह मामला उन प्राधिकारियों की कथित विफलता से जुड़ा है, जिन्होंने भूमि उपयोग और भवन निर्माण संबंधी नियमों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया। इससे पहले 25 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का दायरा पूरे देश तक बढ़ाते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पक्षकार बनाने का निर्देश दिया था।

ताज़ा ख़बर में लगाओ अदालत ने कहा था कि शहरी नियोजन और सार्वजनिक सुरक्षा का यह मुद्दा राष्ट्रीय महत्व का है और सभी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों की राजधानियों में इस पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।

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