सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने और दिल्ली में प्रदर्शन के लिए तीन वैकल्पिक स्थान अधिसूचित करने के दिल्ली पुलिस के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया।

कोर्ट ने कहा कि वह इस बात की जांच करेगा कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में हटाने का निर्णय लेते समय संबंधित अधिकारियों ने सभी पहलुओं पर विचार किया या नहीं।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने 11 अक्टूबर के दिल्ली पुलिस के स्थायी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की। इस आदेश के तहत जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया गया और प्रदर्शन के लिए तीन वैकल्पिक स्थान अधिसूचित किए गए।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने मौखिक टिप्पणी की कि कोर्ट यह देखेगा कि संबंधित प्राधिकरण ने प्रदर्शन स्थल के उपयोग और उसकी प्रभावशीलता को लेकर उचित विचार किया या नहीं।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर वकील मुक्ता गुप्ता ने दलील दी कि प्रदर्शन स्थल ऐसा होना चाहिए, जहां प्रदर्शनकारियों की आवाज सुनी जा सके।

सीनियर वकील गोपाल शंकरनारायणन ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में बहाल करने की मांग की। उन्होंने इस ओर भी ध्यान दिलाया कि अधिसूचना वापस लेने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने आदेश के अनुरूप बताया गया।

इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का आधार सुप्रीम कोर्ट का पिछला फैसला नहीं था।

उन्होंने बताया कि इस विषय पर एक समिति गठित की गई, जिसने अपनी रिपोर्ट सौंपी और उसके बाद निर्णय लेने के कारण भी दर्ज किए गए।

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि इस मुद्दे को तकनीक के नजरिये से भी समझने की जरूरत है। जंतर-मंतर को सरकारी संस्थानों के नजदीक होने के कारण प्रदर्शन स्थल के रूप में बनाए रखने की दलील पर उन्होंने कहा कि कोर्ट इस संबंध में सरकार से जवाब मांगेगा।

याचिका में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर असर पड़ने की आशंका

यह याचिका एडवोकेट स्वाति सिंह ने दायर की। इसमें कहा गया कि प्रदर्शनों को दूर-दराज के इलाकों में स्थानांतरित करने से शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार प्रभावहीन हो सकते हैं।

याचिका के अनुसार, प्रदर्शन का अधिकार केवल किसी निर्धारित स्थान पर एकत्र होने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य शिकायतों और असहमति को व्यक्त करना तथा संबंधित अधिकारियों और समाज का ध्यान उन मुद्दों की ओर आकर्षित करना भी है, जिनके समाधान की आवश्यकता है। इसलिए प्रदर्शन स्थल का स्थान महज प्रशासनिक विषय नहीं है। संबंधित सरकारी संस्थानों से उसकी दूरी, आम लोगों की पहुंच और लक्षित लोगों के बीच उसकी दृश्यता प्रदर्शन की प्रभावशीलता को सीधे प्रभावित कर सकती है।

याचिकाकर्ता ने मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए दिल्ली पुलिस के आदेश को मनमाना और प्रक्रियागत खामियों से युक्त बताया।

याचिका में यह भी कहा गया कि नए निर्धारित प्रदर्शन स्थलों के संचालन के लिए संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) अभी जारी नहीं की गई। ऐसे में प्रदर्शन करने के अधिकार के इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाली व्यवस्था अधूरी और अनिश्चित बनी हुई है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की योजना हमेशा पहले से नहीं बनाई जा सकती। कई बार सरकार के किसी अचानक लिए गए फैसले या घटनाक्रम के जवाब में तत्काल प्रदर्शन की जरूरत पैदा हो सकती है। इसलिए नए स्थलों तक पहुंच और वहां प्रदर्शन आयोजित करने की प्रक्रिया से जुड़े नियमों को बाद के लिए नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

याचिका में चुनौती दिए गए स्थायी आदेश पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि इसके जरिए जंतर-मंतर को तत्काल प्रभाव से प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया गया, जबकि तीन नए स्थानों के लिए विस्तृत और संशोधित एसओपी बाद में जारी किए जाने की बात कही गई। इससे मौजूदा व्यवस्था तो बदल गई, लेकिन नए स्थलों तक पहुंच और वहां प्रदर्शन करने के लिए पूरी प्रक्रिया तत्काल उपलब्ध नहीं कराई गई।

याचिकाकर्ता के मुताबिक, केवल वैकल्पिक स्थानों की पहचान कर देने से प्रदर्शन के अधिकार की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती, खासकर तब जब उन स्थानों के इस्तेमाल की विस्तृत शर्तें और प्रक्रियाएं बाद में तय की जानी हों।

सुप्रीम कोर्ट ने अब मामले में नोटिस जारी कर संबंधित पक्षों से जवाब मांगा। कोर्ट की जांच का प्रमुख मुद्दा यह होगा कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का निर्णय उचित विचार-विमर्श के बाद लिया गया या नहीं और क्या नई व्यवस्था शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को प्रभावी रूप से सुरक्षित रखती है।

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