सुप्रीम कोर्ट न केंद्र सरकार को एक शिकायत पर विचार करने का निर्देश दिया। इस शिकायत में आरोप लगाया गया कि निजी वेरिफिकेशन एजेंसियां ​​कानूनी रूप से ज़रूरी रोज़गार और वित्तीय डेटा (जिसमें EPFO/UAN से जुड़े रिकॉर्ड और PAN से जुड़ी जानकारी शामिल है) का उल्लंघन और कमर्शियल इस्तेमाल कर रही हैं।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह आदेश सीनियर एडवोकेट रुचि कोहली (याचिकाकर्ता की ओर से) की दलीलें सुनने के बाद दिया। यह PIL EPFO/UAN से जुड़े रोज़गार डेटा, PAN से जुड़ी जानकारी, ITR/Form 26AS/AIS से जुड़े वित्तीय डेटा या अन्य सुरक्षित डेटा तक अनधिकृत पहुंच, शेयरिंग, खुलासा, ट्रांसफर या दुरुपयोग को रोकने की मांग के लिए दायर की गई।

कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए केंद्र और अन्य संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता की "विस्तृत" शिकायतों पर विचार करें और EPFO ​​और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट द्वारा इकट्ठा किए गए डेटा के दुरुपयोग को रोकने के लिए ज़रूरी कदम उठाएं।

कोर्ट ने कहा,

"अगर इस पर [4 महीने के भीतर] कोई व्यापक फैसला लिया जाए तो अच्छा होगा।"

संक्षेप में मामला

यह PIL संविधान के आर्टिकल 14, 19(1)(g) और 21 के तहत लोगों के वित्तीय और कानूनी रूप से सुरक्षित पर्सनल डेटा के गैर-कानूनी खुलासे को रोकने के लिए दायर की गई। इसमें एक कथित अनियमित डिजिटल रोज़गार-वेरिफिकेशन सिस्टम के बारे में चिंता जताई गई, जिसमें निजी कंपनियां कथित तौर पर EPFO ​​और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के पास मौजूद डेटा तक पहुंचती हैं, उसे आपस में जोड़ती हैं और कमर्शियल इस्तेमाल करती हैं।

याचिकाकर्ता ने "EPFO Passbook API", "Form 26AS API" और "Income Tax Return API" जैसी कमर्शियल सेवाओं का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि ये सेवाएं ऐसे तकनीकी इकोसिस्टम के होने का संकेत देती हैं, जो संवेदनशील कानूनी रोज़गार और वित्तीय डेटा तक पहुंचने, उसे निकालने, वेरिफाई करने या प्रोसेस करने का दावा करते हैं। उन्होंने दावा किया कि कुछ निजी वेरिफिकेशन सिस्टम में सिर्फ़ PAN और UAN की जानकारी देने से ही किसी व्यक्ति की रोज़गार हिस्ट्री का पता लगाया जा सकता है, बिना किसी OTP या स्पष्ट सहमति के।

याचिका में बताया गया कि याचिकाकर्ता ने केंद्रीय श्रम और रोज़गार मंत्रालय, EPFO, MeitY और CERT-IN को शिकायतें भेजी थीं। इनमें इस बात की जांच करने का अनुरोध किया गया कि कानूनी मजबूरी के तहत जमा किया गया और सुरक्षित सरकारी सिस्टम में रखा गया डेटा निजी रोज़गार-वेरिफिकेशन इकोसिस्टम में कैसे उपलब्ध हो रहा है। इसके अलावा, केंद्रीय वित्त मंत्रालय, IT विभाग और सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्ट टैक्सेस को शिकायतें भेजी गईं। इनमें निजी क्षेत्र में नौकरी की पुष्टि और स्क्रीनिंग की प्रक्रियाओं में टैक्स से जुड़े फाइनेंशियल डेटा तक पहुँच, उसके इस्तेमाल और उस पर निर्भरता को लेकर चिंताएँ जताई गईं। इन शिकायतों में अधिकारियों से यह विचार करने का अनुरोध किया गया कि क्या कोई ऐसा कानूनी ढाँचा, तकनीकी इंटरफ़ेस, सहमति का सिस्टम या सिस्टम की कोई ऐसी कमज़ोरी है, जिसके ज़रिए कानूनी उद्देश्यों से हटकर डेटा तक पहुँच बनाई जा रही है।

Case: PIYUSH CHHABRA v. UNION OF INDIA AND ORS. Diary No.30527/2026

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