सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और CBSE को APAAR सहमति फ़ॉर्म में 'ऑप्ट-आउट' या सहमति न देने का विकल्प जोड़ने का निर्देश दिया

Update: 2026-07-25 19:21 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केंद्र सरकार और सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) को 'ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री' (APAAR) योजना के तहत तय किए गए मॉडल सहमति फ़ॉर्म में बदलाव करने का निर्देश दिया। इस बदलाव का मकसद माता-पिता या अभिभावकों को सहमति न देने या उससे पीछे हटने का स्पष्ट विकल्प देना है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने कहा कि 'रोहित आनंद दास बनाम ओडिशा राज्य (2025)' मामले में ओडिशा हाईकोर्ट के फ़ैसले के पैराग्राफ़ 19 में दिए गए निर्देशों को APAAR योजना लागू करने वाले अधिकारियों द्वारा पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए।

पैराग्राफ़ 19 में हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था:

"इस प्रकार, पहले किए गए विश्लेषण को देखते हुए यह कोर्ट पाती है कि याचिकाकर्ताओं ने इस कोर्ट के हस्तक्षेप के लिए एक मज़बूत मामला बनाया। नतीजतन, रिट याचिका स्वीकार की जाती है। विपक्षी अधिकारियों को निर्देश दिया जाता है कि वे मॉडल सहमति फ़ॉर्म में बदलाव करने पर विचार करें ताकि उसमें 'ऑप्ट-आउट' या सहमति न देने का विकल्प शामिल किया जा सके। याचिकाकर्ताओं के वकील द्वारा DSGI को दिए गए बदलावों वाले मॉडल सहमति फ़ॉर्म पर भी विचार किया जा सकता है। इस संबंध में आज से दो महीने के भीतर ज़रूरी आदेश जारी किए जाएंगे।"

यह निर्देश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ज़ोर दिया कि माता-पिता के लिए 'ऑप्ट-आउट' (बाहर निकलने) का विकल्प एक ज़रूरी सुरक्षा उपाय है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सहमति की ज़रूरत स्पष्ट और पूरी जानकारी के साथ पूरी की जाए:

"हमारी सोच है कि सहमति की ज़रूरत को सार्थक और जानकारीपूर्ण बनाने के लिए ऐसा सुरक्षा उपाय ज़रूरी है। इसलिए हम निर्देश देते हैं कि APAAR योजना लागू करने वाले संबंधित अधिकारियों द्वारा पूरे देश में उक्त फ़ैसले के पैराग्राफ़ 19 में दिए गए निर्देशों को लागू किया जाए।"

यह बेंच CBSE से जुड़े स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों के माता-पिता द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें APAAR योजना की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई। परेशान माता-पिता ने सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह के ज़रिए तर्क दिया कि APAAR योजना असल में शिक्षा क्षेत्र में सरकार द्वारा निगरानी (सर्विलांस) का काम करती है, क्योंकि यह माता-पिता को इससे बाहर निकलने का विकल्प दिए बिना बच्चों की शैक्षिक प्रगति की लंबे समय तक ट्रैकिंग, प्रोफ़ाइलिंग और निगरानी करने की सुविधा देती है।

उन्हें मुख्य रूप से इस बात से परेशानी थी कि यह स्कीम बड़े पैमाने पर डेटा इकट्ठा करने और उसे सुरक्षित रखने की इजाज़त देती है, जिसका इस्तेमाल शिक्षा के दायरे से बाहर भी किया जा सकता है। इसलिए माता-पिता ने अपने-अपने स्कूलों को बता दिया था कि वे APAAR ID बनाने के लिए अपनी सहमति नहीं देंगे।

जयसिंह ने यह भी बताया कि शिक्षा मंत्रालय के 11 अक्टूबर, 2023 के सर्कुलर के अनुसार, माता-पिता की सहमति ज़रूरी थी, लेकिन तय किए गए फ़ॉर्म में न तो इसमें शामिल न होने का विकल्प दिया गया है और न ही साफ़ तौर पर और पूरी जानकारी के साथ यह बताया गया है कि इकट्ठा की गई जानकारी का मकसद, दायरा या उसे कितने समय तक सुरक्षित रखा जाएगा, क्या है।

इसके अलावा, CBSE ने 5 अगस्त, 2025 और 27 अगस्त, 2025 के अपने दो सर्कुलर के ज़रिए, 2026 के एकेडमिक साल से शुरू होने वाली बोर्ड परीक्षाओं के लिए कक्षा 9 से 12 तक के छात्रों के रजिस्ट्रेशन के लिए APAAR ID का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य शर्त बना दिया।

चूंकि APAAR ID आधार से जुड़ी है, इसलिए इसे लेने की मजबूरी का असल मतलब आधार प्रोग्राम में एनरोल होने की मजबूरी है, जिसे सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फ़ैसले के अनुसार बच्चों पर थोपा नहीं जा सकता।

कुल मिलाकर, जयसिंह ने ज़ोर देकर कहा कि ये उपाय कानूनी वैधता, सही मकसद, ज़रूरत और आनुपातिकता (proportionality) की कसौटियों पर खरे नहीं उतरते, जो सरकारी कार्रवाई को नियंत्रित करते हैं, इसलिए ये जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी फ़ैसले (2017) में बताए गए निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करते हैं।

डेटा प्रोटेक्शन एक्ट का पालन करें; तीसरे पक्ष (third parties) के साथ डेटा शेयर न करें

बेंच ने इस तर्क पर भी विचार किया कि इकट्ठा किए गए डेटा का गलत इस्तेमाल हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के अनुसार पर्सनल डेटा की सुरक्षा करें।

"इसलिए APAAR स्कीम के तहत पर्सनल जानकारी को इकट्ठा करने, प्रोसेस करने, स्टोर करने, बनाए रखने, शेयर करने या इस्तेमाल करने का काम पूरी तरह से 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023' के नियमों और डेटा फिड्यूशियरी (डेटा संभालने वालों) की जिम्मेदारियों के तहत किया जाएगा, ताकि पर्सनल डेटा की प्रोसेसिंग कानूनी, सुरक्षित और तय मकसद के लिए हो। संबंधित अधिकारियों को यह पक्का करना होगा कि इस कानून में बताए गए सुरक्षा उपायों का सख्ती से पालन किया जाए।"

इसके अलावा, बेंच ने कहा कि APAAR स्कीम के तहत इकट्ठा की गई पर्सनल जानकारी को किसी प्राइवेट संस्था या तीसरे पक्ष (थर्ड पार्टी) को न तो बताया जा सकता है, न ही शेयर किया जा सकता है और न ही उपलब्ध कराया जा सकता है।

"यह बात साफ है कि APAAR स्कीम के तहत इकट्ठा की गई किसी भी पर्सनल जानकारी को कानून के मुताबिक और स्कीम में तय मकसद के अलावा किसी प्राइवेट संस्था या तीसरे पक्ष (थर्ड पार्टी) को न तो बताया जा सकता है, न ही शेयर किया जा सकता है और न ही उपलब्ध कराया जा सकता है। स्कीम के दायरे से बाहर या किसी दूसरे मकसद के लिए ऐसी जानकारी शेयर करना मंजूर नहीं होगा।"

इन निर्देशों के साथ याचिका का निपटारा कर दिया गया।

यह याचिका एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड पारस नाथ सिंह के ज़रिए दायर की गई।

Case Details : ABHISHEK BAXI Vs UNION OF INDIA|WP.(C) No. 832/2026

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