महुआ मोइत्रा मामले में लोकपाल कानून की व्याख्या पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट, नोटिस जारी

Update: 2026-03-13 07:26 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा को नोटिस जारी करते हुए उस याचिका पर सुनवाई करने का फैसला किया, जिसमें लोकपाल ने दिल्ली हाइकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी। इस फैसले में कहा गया था कि लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के तहत आरोपपत्र दाखिल करने और अभियोजन शुरू करने के लिए अलग-अलग मंजूरी का प्रावधान नहीं है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने मामले की प्रारंभिक सुनवाई करते हुए कहा कि कानून की धारा 20(7)(क) और धारा 20(8) के बीच संबंध और उनके प्रभाव की विस्तृत जांच आवश्यक है। अदालत ने अंतरिम तौर पर यह भी स्पष्ट किया कि हाइकोर्ट के आदेश के पैरा 89 के अनुसार लोकपाल को अभियोजन की मंजूरी पर अभी निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं होगी।

दिल्ली हाइकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि लोकपाल अधिनियम की धारा 20 के तहत आरोपपत्र दाखिल करने के लिए अलग से मंजूरी देने की व्यवस्था नहीं है और अभियोजन के लिए मंजूरी एक समेकित रूप से दी जाती है। इसी आधार पर हाइकोर्ट ने लोकपाल द्वारा केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को महुआ मोइत्रा के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल करने की दी गई मंजूरी रद्द की थी। इस व्याख्या को चुनौती देते हुए लोकपाल सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है।

सुनवाई के दौरान लोकपाल की ओर से सीनियर वकील रंजीत कुमार ने कहा कि उनकी आपत्ति हाइकोर्ट द्वारा कानून की की गई व्याख्या से है किसी विशेष व्यक्ति से नहीं। वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि CBI हाइकोर्ट की व्याख्या का समर्थन करती है। हालांकि, महुआ मोइत्रा के खिलाफ जांच जारी रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मुख्य सवाल यह है कि क्या कानून में दो चरणों में मंजूरी का प्रावधान है एक आरोपपत्र दाखिल करने के लिए और दूसरा अभियोजन शुरू करने के लिए।

इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने टिप्पणी की कि कानून में अलग-अलग चरण दिखाई देते हैं। यह भी संभव है कि लोकपाल यह तय करे कि अभियोजन जांच एजेंसी की बजाय उसकी अपनी एजेंसी द्वारा चलाया जाए। उन्होंने कहा कि इन प्रावधानों को नए आपराधिक कानून और भ्रष्टाचार निवारण कानून के संदर्भ में भी समझना होगा।

खंडपीठ ने जब नोटिस जारी करने का संकेत दिया तो महुआ मोइत्रा की ओर से सीनियर वकील निधेश गुप्ता ने यथास्थिति बनाए रखने का अनुरोध किया। इस पर अदालत ने कहा कि हाइकोर्ट के आदेश के पैरा 89 के पालन से फिलहाल लोकपाल को छूट देने से दोनों पक्षों की चिंता दूर हो जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही मुद्दे पर दिए गए अन्य हाइकोर्ट के फैसलों को चुनौती देने वाली लोकपाल की याचिकाओं पर भी नोटिस जारी किया।

यह विवाद तथाकथित कैश के बदले सवाल प्रकरण से जुड़ा है। आरोप है कि महुआ मोइत्रा ने उद्योगपति दर्शन हीरानंदानी के कहने पर संसद में सवाल पूछने के बदले लाभ लिया। महुआ मोइत्रा ने इस आरोप से इनकार किया। हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि उन्होंने अपने संसद लॉग-इन और पासवर्ड की जानकारी हीरानंदानी को दी थी।

इस मामले की शुरुआत तब हुई, जब भारतीय जनता पार्टी (BJP) सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा अध्यक्ष को शिकायत देकर आरोप लगाया कि महुआ मोइत्रा ने संसद में सवाल पूछने के लिए रिश्वत ली। इसके बाद महुआ मोइत्रा ने दुबे, एडवोकेट जय देहद्राई और कुछ मीडिया हाउस को कानूनी नोटिस भेजकर आरोपों से इनकार किया था।

दिल्ली हाइकोर्ट में महुआ मोइत्रा ने लोकपाल के 12 नवंबर, 2025 के आदेश को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि लोकपाल ने उनके लिखित जवाब और दलीलों पर विचार किए बिना ही आरोपपत्र दाखिल करने की मंजूरी दी, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।

हाइकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि लोकपाल अधिनियम में अभियोजन की मंजूरी का केवल एक ही चरण है और धारा 20(8) केवल यह तय करने के लिए है कि अभियोजन किस एजेंसी द्वारा चलाया जाएगा, न कि यह दूसरा मंजूरी चरण बनाता है।

अब इस पूरे मुद्दे की अंतिम व्याख्या सुप्रीम कोर्ट करेगा।

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