दिल्ली बार काउंसिल चुनाव: मतगणना पर रोक हटाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, कहा- मामले में गंभीर मुद्दे

Update: 2026-05-21 07:43 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली बार काउंसिल चुनावों की मतगणना जारी रखने की अनुमति देने से इनकार किया।

अदालत ने कहा कि मामले में गंभीर मुद्दे शामिल हैं और फिलहाल पहले पारित रोक संबंधी आदेश में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने मौखिक अनुरोध करते हुए कहा कि मतगणना की प्रक्रिया जारी रहने दी जाए, भले ही अंतिम परिणाम घोषित न किए जाएं।

इस पर चीफ जस्टिस ने कहा,

“हम इसकी अनुमति नहीं देंगे। मामले में गंभीर मुद्दे हैं। आप हाईकोर्ट के सामने अपनी दलीलें रखें। यह केवल अंतरिम व्यवस्था है। हम हाइकोर्ट को प्रभावित नहीं करना चाहते। हमारे समक्ष अब कुछ लंबित नहीं है। आदेश में संशोधन नहीं किया जाएगा, इसके कारण हैं।”

विकास सिंह ने अदालत को बताया कि जस्टिस सुधांशु धूलिया समिति पहले ही मतगणना जारी रखने की अनुमति दे चुकी है। उन्होंने कहा कि दिल्ली बार काउंसिल चुनावों पर लगभग 5 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है।

उन्होंने दलील दी,

“प्रक्रिया जारी रहने दी जाए लेकिन परिणाम घोषित न हों। अंतिम परिणाम दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के अधीन रखे जा सकते हैं।”

हालांकि चीफ जस्टिस अपने रुख पर कायम रहे और दोहराया कि मामले में गंभीर प्रश्न शामिल हैं।

सुनवाई के दौरान उम्मीदवारों की ओर से पेश वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का रोक आदेश बिना उन्हें सुने पारित किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव प्रक्रिया पर पहले किसी ने कोई आपत्ति नहीं उठाई थी।

वकील ने अदालत को बताया कि दिल्ली बार काउंसिल प्रतिदिन लगभग 5 लाख रुपये खर्च कर रही है और मतपत्र खुले पड़े हैं।

इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि सभी दलीलें दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष रखी जा सकती हैं। जब अदालत को बताया गया कि हाईकोर्ट 29 मई से ग्रीष्मकालीन अवकाश पर जा रहा है, तब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से मामले की जल्द सुनवाई का अनुरोध करने पर सहमति जताई।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने आदेश में कहा कि मामले की तात्कालिकता को देखते हुए दिल्ली हाइकोर्ट के मुख्य जस्टिस से अनुरोध किया जाता है कि इसे यथासंभव सोमवार को खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पक्षकार अंतरिम राहत के लिए हाईकोर्ट का रुख कर सकते हैं और हाईकोर्ट कानून के अनुसार उस पर विचार करेगा।

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