दिल्ली में प्रदर्शनों से जुड़े मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में उन मीडिया रिपोर्टों और सोशल मीडिया पोस्ट पर आपत्ति जताई, जिनमें दावा किया गया कि सरकार ने अपने आचरण के लिए अदालत से माफी मांग ली है और अब उसके पास कहने के लिए कुछ नहीं है।

मेहता ने कहा कि सरकार के हलफनामों में बिना शर्त माफी का उल्लेख कानूनी प्रक्रिया के तहत किया गया, लेकिन रिपोर्टों में इस संदर्भ को नजरअंदाज कर दिया गया।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच के सामने सुनवाई के दौरान मेहता ने स्पष्ट किया कि अदालत ने अवमानना के मामलों में नोटिस जारी किए और अधिकारियों की ओर से जवाब दाखिल किए गए।

उन्होंने कहा कि अवमानना नोटिस के जवाब में सबसे पहले बिना शर्त माफी मांगना स्थापित कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। इसके बाद हलफनामे में यह बताया जाता है कि संबंधित पक्ष के अनुसार अवमानना क्यों नहीं बनती।

तुषार मेहता ने कहा कि अधिकारियों के हलफनामों का पहला पैराग्राफ इसी कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए लिखा गया।

उन्होंने अदालत से कहा कि मीडिया और सोशल मीडिया में यह प्रचार किया जा रहा है कि सरकार ने माफी मांग ली है और उसके पास आगे कुछ कहने को नहीं है, जबकि सरकार ने अपने जवाब में कार्रवाई का बचाव भी किया।

मेहता की दलील सुनने के बाद चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अदालत ने उन खबरों को देखा ही नहीं है, जिनका सॉलिसिटर जनरल उल्लेख कर रहे हैं। चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि कोर्ट ऐसी किसी रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान नहीं ले रहा है।

वहीं, जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि अदालत न तो उन खबरों पर संज्ञान ले रही है और न ही बिना शर्त माफी के कथन को अलग से आधार बना रही है।

उन्होंने टिप्पणी की कि सॉलिसिटर जनरल की दलीलों से स्पष्ट है कि माफी के बाद सरकार ने अपने पक्ष में स्पष्टीकरण भी दिया।

इस पर तुषार मेहता ने कहा कि सरकार की ओर से मांगी गई माफी बिना किसी शर्त के है, लेकिन उसके बाद हलफनामे में संबंधित घटनाक्रम और सरकार का पक्ष स्पष्ट किया गया।

सुनवाई के दौरान मुख्य मुद्दा यह था कि अवमानना नोटिस के जवाब में हलफनामे की शुरुआत में माफी मांगने के कानूनी महत्व को मीडिया रिपोर्टों में किस तरह प्रस्तुत किया गया।

सॉलिसिटर जनरल ने अदालत के सामने सरकार का पक्ष स्पष्ट करते हुए कहा कि शुरुआती माफी को सरकार की ओर से अपने पूरे रुख से पीछे हटने या आरोपों को स्वीकार करने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

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