सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका: तीसरे जज के अलग होने के बाद कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से दूसरी पीठ के समक्ष सुनवाई की मांग की
सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि वकील एवं सोशल एक्टिविस्ट सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका को किसी दूसरी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए। यह अनुरोध जस्टिस श्री चंद्रशेखर के मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग करने के बाद किया गया।
मामले का उल्लेख चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष किया गया।
सिब्बल ने अदालत को बताया कि हाल ही में भीमा कोरेगांव मामले में गाडलिंग को जमानत मिली और इसी दौरान इस मामले की सुनवाई सूचीबद्ध हुई थी लेकिन पीठ के एक जज ने स्वयं को सुनवाई से अलग कर लिया।
इस पर चीफ जस्टिस ने कहा,
"इसके पीछे निश्चित रूप से कोई उचित कारण होगा। इसके बाद सिब्बल ने अनुरोध किया कि मामले को किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।
यह मामला महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के वर्ष 2016 के आगजनी प्रकरण से जुड़ा है। गाडलिंग ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसमें उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया गया।
गाडलिंग जून 2018 से भीमा कोरेगांव मामले में भी राष्ट्रीय जांच एजेंसी (ANI) की हिरासत में हैं। उन पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत माओवादी संगठन से संबंध रखने के आरोप लगाए गए।
अभियोजन का आरोप है कि गाडलिंग ने गढ़चिरौली के एटापल्ली तहसील स्थित सुरजागढ़ खदानों से लौह अयस्क ले जा रहे 80 से अधिक वाहनों में आग लगाने की साजिश में भूमिका निभाई और सह-आरोपियों को ऐसा करने के निर्देश दिए।
इस मामले में अब तक तीन जज सुनवाई से स्वयं को अलग कर चुके हैं। इससे पहले जस्टिस अतुल चांदुरकर और जस्टिस एम.एम. सुंदरेश भी मामले की सुनवाई से अलग हो चुके हैं।
पिछले वर्ष सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मुकदमे में हो रही लंबी देरी पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या किसी व्यक्ति को वर्षों तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रखा जा सकता है। साथ ही महाराष्ट्र सरकार से मुकदमे में देरी के कारण, आरोपमुक्ति की अर्जियों के लंबित रहने की वजह, अभियोजन की सुनवाई की योजना और मुकदमा कब तक पूरा होगा, इस संबंध में जानकारी मांगी थी।
गाडलिंग की ओर से सीनियर एडवोकेट आनंद ग्रोवर ने अदालत को बताया कि मामले का मुख्य साक्ष्य इलेक्ट्रॉनिक है, जो भीमा कोरेगांव मामले से भी जुड़ा हुआ है लेकिन उसकी प्रतियां अभी तक उपलब्ध नहीं कराई गईं। उन्होंने यह भी कहा था कि स्थायी लोक अभियोजक के बिना ही मुकदमे की कार्यवाही चल रही है।
दूसरी ओर एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने कहा कि भीमा कोरेगांव मामले के रिकॉर्ड स्थानांतरित करने का आवेदन विचाराधीन है और गाडलिंग ने अभी तक उस पर जवाब दाखिल नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट पहले वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग व्यवस्था में आ रही तकनीकी दिक्कतों पर भी महाराष्ट्र सरकार को आवश्यक व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश दे चुका है। गाडलिंग की ओर से अदालत को बताया गया था कि इसके बावजूद कई सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग काम नहीं कर सकी और वह पिछले सात वर्षों से बिना मुकदमे के निष्कर्ष के जेल में हैं।