'एक महिला होकर दूसरी महिला के लिए ऐसी भाषा': सुप्रीम कोर्ट ने महिला वकील को लगाई कड़ी फटकार

Update: 2026-02-11 08:34 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महिला वकील द्वारा बलात्कार पीड़िता के खिलाफ फेसबुक पोस्ट किए जाने पर कड़ी नाराज़गी जताई। कोर्ट ने कहा कि जिस भाषा का इस्तेमाल किया गया, वह न केवल आपत्तिजनक है बल्कि एक महिला वकील से ऐसी अपेक्षा बिल्कुल नहीं की जा सकती।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ के समक्ष यह मामला केरल की एडवोकेट दीपा जोसेफ की याचिका पर आया था। दीपा जोसेफ ने केरल पुलिस द्वारा गिरफ्तारी की आशंका जताते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। यह पोस्ट केरल के कांग्रेस विधायक राहुल मामकूट्टाथिल के खिलाफ दर्ज बलात्कार के एक मामले की शिकायतकर्ता को लेकर की गई।

सुनवाई की शुरुआत में ही पीठ ने फेसबुक पोस्ट की भाषा और लहजे पर गहरी असहमति जताई।

चीफ जस्टिस ने याचिकाकर्ता से कहा,

“क्या आपसे इस तरह की भाषा की अपेक्षा की जाती है? आप एक एडवोकेट हैं।”

इस पर दीपा जोसेफ ने जवाब दिया कि पोस्ट की सामग्री उन्हें पीड़िता के पति से मिली जानकारी पर आधारित थी।

उन्होंने कहा,

“पीड़िता के पति मेरे पास आए, उन्होंने मुझे जानकारी दी और उसी के आधार पर मैंने पोस्ट किया।”

इस जवाब से असंतुष्ट होकर चीफ जस्टिस ने सवाल किया

“क्या हम एक प्रैक्टिस कर रही महिला एडवोकेट से यह उम्मीद करते हैं कि वह ऐसी बातें लिखे?”

दीपा जोसेफ ने यह भी दावा किया कि उन्होंने न तो कोई मानहानिकारक बात लिखी और न ही पीड़िता की पहचान उजागर की।

जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने पोस्ट की भाषा को लेकर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह एक महिला के प्रति अत्यंत अपमानजनक है।

वहीं चीफ जस्टिस ने कहा,

“मुझे हैरानी है कि एक महिला दूसरी महिला के खिलाफ इस तरह लिख सकती है। आपने अपनी शब्दावली का एक भी शब्द नहीं छोड़ा और फिर भी आपको कोई पछतावा नहीं है। क्या हम सार्वजनिक रूप से पढ़कर सुनाएं कि आपने क्या लिखा है?”

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि पोस्ट में केवल वही जानकारी साझा की गई, जो शिकायतकर्ता के पति ने दी।

इस पर चीफ जस्टिस ने तीखा सवाल किया,

“अगर कोई व्यक्ति वह भी पति, आप पर भरोसा करके आपके पास आया, क्योंकि आप एक एडवोकेट हैं तो क्या आप उस निजी जानकारी को सार्वजनिक मंच पर डाल देंगी?”

चीफ जस्टिस ने आगे कहा,

“क्या उस पति ने आपको यह सारा बकवास लिखने के लिए कहा था?”

इस पर दीपा जोसेफ ने जवाब दिया,

“यह बकवास नहीं है, सर।”

जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता इस मुकदमे के ज़रिये एक खास नैरेटिव को उजागर और प्रचारित कर रही हैं, जिसे कोर्ट निंदनीय मानता है।

उन्होंने सवाल किया,

“क्या आप यह मुकदमा अपने अधिकारों की रक्षा के लिए ला रही हैं या किसी ऐसे दृष्टिकोण को सार्वजनिक करने के लिए, जो आपराधिक जिम्मेदारी की सीमा को छूता है?”

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि वह केवल यह चाहती हैं कि पुलिस गिरफ्तारी से जुड़े दिशा-निर्देशों का पालन करे। इस पर खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि इसके लिए उचित मंच हाइकोर्ट है।

जस्टिस बागची ने कहा,

“यह इस मुद्दे की जांच करने का मंच नहीं है।”

जब दीपा जोसेफ ने यह अनुरोध किया कि उन्हें एक महिला होने के नाते सुना जाए तो जस्टिस बागची ने पलटकर कहा,

“एक महिला होकर आपने दूसरी महिलाओं के बारे में किस तरह की टिप्पणियां की हैं?”

चीफ जस्टिस ने भी सख्त लहजे में कहा,

“अगर यह सब किसी पुरुष ने लिखा होता तो हम उसे यहीं गिरफ्तार करवा देते।”

अंत में याचिकाकर्ता के वकील ने अनुरोध किया कि पुलिस पूछताछ वर्चुअल माध्यम से कराने का निर्देश दिया जाए। कोर्ट ने यह मांग भी स्वीकार नहीं की और कहा कि याचिकाकर्ता हाइकोर्ट का रुख कर सकती हैं।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को हाइकोर्ट जाने की स्वतंत्रता दी।

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