सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस दीपांकर दत्ता ने 2023 के कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया की निष्पक्षता पर शुरुआती तौर पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा नॉमिनेट किए गए केंद्रीय कैबिनेट मंत्री से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे चयन प्रक्रिया में प्रधानमंत्री का विरोध करेंगे।

जस्टिस दत्ता ने शुरुआती तौर पर कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा नॉमिनेट किए गए कैबिनेट मंत्री से प्रधानमंत्री के खिलाफ एक स्वतंत्र और संतुलित भूमिका निभाने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

उन्होंने कहा,

"प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति में तीसरे सदस्य के तौर पर काम करने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा नॉमिनेट किए गए मंत्री से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे अपने नॉमिनेटर (नॉमिनेट करने वाले) का विरोध करेंगे और समिति में नॉमिनेटेड सदस्य के तौर पर अपनी जगह को खतरे में डालेंगे।"

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने इस बात पर अपनी राय दी कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 को चुनौती देने वाली याचिकाओं को संवैधानिक पीठ के पास भेजा जाना चाहिए।

याचिकाओं में 2023 के अधिनियम की धारा 7 को चुनौती दी गई, जिसमें तीन सदस्यीय चयन समिति का प्रावधान है। इस समिति में प्रधानमंत्री अध्यक्ष होते हैं। साथ ही लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नॉमिनेट किए गए केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं।

मामले को रेफर करने (आगे भेजने) का फैसला करने से पहले, उन्होंने शुरुआती तौर पर कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए भारत निर्वाचन आयोग (ECI) का न केवल स्वतंत्र होना ज़रूरी है, बल्कि उसका स्वतंत्र रूप से काम करते हुए दिखना भी ज़रूरी है।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि प्रधानमंत्री के नॉमिनी को शामिल करने से चयन समिति की संस्थागत निष्पक्षता कमज़ोर होती है, क्योंकि प्रधानमंत्री के नॉमिनी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे प्रधानमंत्री का विरोध करेंगे और विपक्ष के नेता का समर्थन करेंगे।

जस्टिस दत्ता को याचिकाकर्ताओं का तर्क सही लगा और उन्होंने कहा कि समिति के दो सदस्य कार्यपालिका (सरकार) से होने के कारण चयन प्रक्रिया पर कार्यपालिका का असल में वीटो अधिकार हो जाता है।

उन्होंने कहा,

"जब इस कोर्ट ने पूछा कि क्या प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के बीच मतभेद होने पर प्रधानमंत्री का नॉमिनी प्रधानमंत्री के खिलाफ स्टैंड लेगा तो अटॉर्नी जनरल का जवाब 'शायद नहीं' था, जबकि चुनौती देने वालों का कहना है कि नतीजा निश्चित रूप से 'नहीं' ही होगा।"

जस्टिस दत्ता ने कहा कि कोर्ट के सवाल का जवाब "नहीं" होने की संभावना भी सिलेक्शन कमिटी की सोच पर असर डालने के लिए काफ़ी है।

उन्होंने कहा,

"'नहीं' की संभावना का होना ही सिलेक्शन कमिटी की सोच को प्रभावित करने के लिए काफ़ी है।"

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि भले ही इस प्रक्रिया से की गई नियुक्तियाँ योग्यता के आधार पर हों, लेकिन यह तरीका "सोच या धारणा की कसौटी" (perception test) पर खरा नहीं उतरेगा। उन्होंने इसकी तुलना क्रिकेट मैच में एक टीम के कप्तान द्वारा अंपायर चुने जाने से की और कहा कि अगर अंपायर को असल में जीतने वाली टीम का कप्तान चुनता है, तो सही फैसलों पर भी शक की गुंजाइश बनी रहती है।

जस्टिस दत्ता ने इस तर्क को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक ज़रूरत के लिहाज़ से अहम माना।

उन्होंने कहा,

"अगर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने हैं, तो यह बात साफ़ है कि ECI न सिर्फ़ एक स्वतंत्र संस्था होनी चाहिए, बल्कि उसे स्वतंत्र रूप से काम करते हुए दिखना भी चाहिए।"

उन्होंने कहा कि सिलेक्शन कमिटी से चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) को बाहर रखने के आधार पर 2023 के कानून को सीधे चुनौती देने पर शायद वह कानून बच जाए। हालांकि, उन्होंने कहा कि इस तरीके को "सोच या धारणा की कसौटी" पर भी खरा उतरना होगा, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार ज़रूरी माना है।

जस्टिस दत्ता ने सवाल उठाया कि क्या धारा 7 के तहत बनी सिलेक्शन कमिटी उतनी ही स्वतंत्र दिखती है, जितनी कि 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई अस्थायी व्यवस्था थी, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI की एक कमिटी बनाने का प्रावधान था।

उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि मुद्दा यह नहीं है कि 2023 के एक्ट के तहत नियुक्त होने वाले लोगों में चरित्र या ईमानदारी की कमी होगी, बल्कि यह था कि क्या कानूनी प्रक्रिया से जनता में वैसा ही भरोसा पैदा होता है जैसा किसी निष्पक्ष तीसरे सदस्य की मौजूदगी से होता।

उन्होंने संविधान के आर्टिकल 75(3) के तहत सामूहिक ज़िम्मेदारी के सिद्धांत का हवाला दिया और कहा कि मंत्री, जो मंत्रिपरिषद का हिस्सा होता है और सामूहिक ज़िम्मेदारी से बंधा होता है, उससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह किसी संवेदनशील संवैधानिक पद पर नियुक्ति के मामले में प्रधानमंत्री से असहमत होगा। उन्होंने कहा कि नतीजतन, विपक्ष के नेता की मौजूदगी "काफी हद तक दिखावटी" हो जाती है।

उन्होंने कहा,

"ऐसी स्थिति में चयन समिति में कैबिनेट मंत्री को शामिल करने से वह स्वतंत्र संतुलन नहीं मिल पाता जो एक निष्पक्ष चयनकर्ता दे सकता है; कैबिनेट मंत्री तो बस अपने नेता की बात दोहराएंगे। नतीजतन, चयन समिति में विपक्ष के नेता की मौजूदगी काफी हद तक दिखावटी रह जाती है और उन्हें शामिल करने का मकसद पूरा नहीं होता।"

जस्टिस दत्ता ने माना कि याचिकाकर्ताओं की यह दलील कि 2023 का एक्ट एग्जीक्यूटिव (कार्यपालिका) को "बहुत ज़्यादा चयन शक्तियां" देता है। इस तरह आर्टिकल 324 के तहत ज़रूरी आज़ादी और संविधान के मूल ढांचे की छवि को कमज़ोर करता है, प्रथम दृष्टया सही है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि प्रधानमंत्री के पद पर संवैधानिक भरोसा होने का मतलब है कि प्रधानमंत्री द्वारा लिए गए फैसलों पर शक नहीं किया जाना चाहिए।

हालांकि, जस्टिस दत्ता इससे सहमत नहीं थे और उन्होंने इस तर्क को राजनीतिक व्यवस्था के असल कामकाज से जोड़ा। उन्होंने कहा कि सत्ताधारी सरकारों की इच्छाशक्ति की कमी और संवैधानिक नैतिकता का पालन न करने के कारण संविधान में परिकल्पित संवैधानिक आदर्श काफी हद तक पूरे नहीं हो पाए हैं, जिससे संस्थाओं का क्षरण हुआ है।

उन्होंने आगे कहा कि राजनीतिक पार्टियां बेदाग़ रिकॉर्ड और बेमिसाल ईमानदारी वाले लोगों के बजाय अपराधों (जिनमें नैतिक पतन वाले अपराध भी शामिल हैं) के आरोपी लोगों को बढ़ावा देती दिखती हैं।

हालांकि उन्होंने माना कि सार्वजनिक हस्तियों की छवि खराब करने के लिए उन पर झूठे मामले भी दर्ज किए जाते हैं, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि सांसदों, विधायकों और मंत्रियों के आपराधिक इतिहास से जुड़े आंकड़े चिंता पैदा करते हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि ये शुरुआती टिप्पणियां हैं, न कि इस राय में 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम फैसला।

दो जजों की बेंच इस बात पर सहमत नहीं हो पाई कि क्या इस मामले को संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए। जस्टिस दत्ता का मानना ​​था कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तथा ECI की स्वतंत्रता पर मौजूदा संवैधानिक कानून पहले से तय है और 2023 के कानून को उन्हीं सिद्धांतों के आधार पर परखा जाना चाहिए।

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा का मानना ​​था कि क्या संसद चयन समिति से किसी निष्पक्ष चयनकर्ता को बाहर रख सकती है, यह संवैधानिक व्याख्या का एक अहम सवाल है जिस पर पहले कोई फैसला नहीं हुआ है।

आखिरकार, मामले को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के सामने रखने का निर्देश दिया गया ताकि वह 2023 के कानून की धारा 7 और अन्य विवादित प्रावधानों की वैधता तय करने के लिए संविधान पीठ के गठन पर विचार कर सकें।

Case Title - Dr. Jaya Thakur v. Union of India and connected cases

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