सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के कथित उल्लंघन के लिए CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अवमानना कार्रवाई की मांग
सुप्रीम कोर्ट के वकील ने अटॉर्नी जनरल से मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की अनुमति मांगी। वकील का आरोप है कि CEC ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के कामकाज से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की जानबूझकर अनदेखी की।
वकील ब्रजेश सिंह ने 24 सितंबर को अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को लिखे पत्र में 'कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971' की धारा 15(1)(b) और धारा 2(c), तथा 'सुप्रीम कोर्ट में अवमानना कार्यवाही को विनियमित करने वाले नियम, 1975' के नियम 3 का हवाला दिया।
यह अनुरोध 'द इंडियन एक्सप्रेस' की 23 सितंबर की रिपोर्ट के बाद किया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम-से-कम 14 मौकों पर चुनाव आयोग द्वारा उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए गए फैसलों पर आपत्ति जताई। रिपोर्ट के अनुसार, ये आपत्तियां मुख्य रूप से 'फॉर्म 6' में बदलाव, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, तथा मतदाता सूची डेटाबेस तक पहुंच के केंद्रीकरण से संबंधित थीं।
सिंह के पत्र के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कई फैसलों को "अनधिकृत" और "गैर-कानूनी" बताया था। उनका आरोप है कि इन कार्यों से तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के संवैधानिक कामकाज के तरीके से विचलन (हटकर काम करना) झलकता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (नज़ीरों) का कथित उल्लंघन
अनुरोध में बताए गए मुख्य आधारों में से एक 'टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का कथित उल्लंघन है।
सिंह का तर्क है कि इस फैसले के अनुसार चुनाव आयोग को बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय के रूप में काम करना चाहिए और CEC 'समानों में प्रथम' (primus inter pares) होता है, न कि कोई सर्वशक्तिमान अधिकारी।
सुप्रीम कोर्ट ने 'टी.एन. शेषन' मामले में कहा कि CEC को "संस्था से अधिक शक्तिशाली" के रूप में पेश नहीं किया जा सकता और बहु-सदस्यीय चुनाव आयोग के फैसले पूरे आयोग के फैसले होते हैं, न कि केवल उसके अध्यक्ष के। सिंह ने 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फ़ैसले का भी हवाला दिया। इस फ़ैसले में चुनाव आयोग से जुड़े संवैधानिक ढांचे पर बात की गई और स्वतंत्र चुनाव आयोग के महत्व पर ज़ोर दिया गया, ताकि निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित किए जा सकें। फ़ैसले में ECI को एक ऐसी संस्था बताया गया, जिसे निष्पक्ष, पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई।
अदालत की अवमानना की याचिका में आरोप लगाया गया कि "पूर्ण आयोग" के नाम पर फ़ैसले या सूचनाएं जारी करते समय अन्य चुनाव आयुक्तों को नज़रअंदाज़ करना, संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून की जानबूझकर की गई अवहेलना होगी।
सिंह ने एक और तर्क यह दिया कि अन्य चुनाव आयुक्तों की भागीदारी या मंज़ूरी के बिना चुनावी डेटाबेस और वोटर लिस्ट में किए गए कथित बदलाव, चल रही चुनावी प्रक्रियाओं और चुनावी पारदर्शिता से जुड़ी न्यायिक जांच में बाधा डाल सकते हैं।
अनुरोध में 'इंडियन एक्सप्रेस' की जांच का हवाला देते हुए बताया गया कि संधू और जोशी ने वोटर लिस्ट डेटाबेस के "धीरे-धीरे सेंट्रलाइज़ेशन" (केंद्र के नियंत्रण में आने) पर चिंता जताई और सिस्टम तक कानूनी चुनावी अधिकारियों की पहुंच पर लगी पाबंदियों पर सवाल उठाए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों कमिश्नरों ने 'फॉर्म 6' (वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाला कानूनी फॉर्म) में किए गए बदलाव पर आपत्ति जताई, क्योंकि इस प्रक्रिया में पिछली 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' से जुड़े सवाल शामिल किए गए।
हालांकि, ECI ने 'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट में मतभेद की बात को खारिज किया। उनका कहना है कि उठाए गए मुद्दे ऑपरेशनल सवाल, सुझाव और ड्राफ्ट स्टेज पर दी गई राय थे, और कमीशन ने जो भी फैसले लिए, वे सर्वसम्मति से लिए गए।
सिंह ने कहा कि 'इंडियन एक्सप्रेस' की जांच में सामने आई बातें संवैधानिक व्यवस्था के "लिखित रूप में उल्लंघन" की ओर इशारा करती हैं। उन्होंने तर्क दिया कि कमीशन के सिर्फ़ एक या दो सदस्यों द्वारा लिए गए कथित फैसलों को केवल आंतरिक प्रशासनिक मामले नहीं माना जा सकता।
'कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट्स एक्ट' की धारा 15(1)(b) किसी भी व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट में आपराधिक अवमानना (क्रिमिनल कंटेम्प्ट) के लिए प्रस्ताव या याचिका दायर करने की इजाज़त देती है, बशर्ते उन्हें एडवोकेट-जनरल या सुप्रीम कोर्ट के लिए अटॉर्नी-जनरल की लिखित सहमति मिल गई हो।
अगर सहमति मिल जाती है तो इसके बाद CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सकती है।
गौरतलब है कि कल, 23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने अपनी अलग राय में मौजूदा चयन प्रक्रिया की स्वतंत्रता पर शुरुआती संदेह जताया।