न्यायमूर्ति वीके ताहिलरमानी के स्थानांतरण को चुनौती देने वाली याचिका खारिज, कहा केवल जज चुनौती दे सकते हैं

Update: 2019-09-28 17:00 GMT

मद्रास हाईकोर्ट ने इस सप्ताह की शुरुआत में एक वकील की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश विजया के ताहिलारामानी के मेघालय उच्च न्यायालय में स्थानांतरण को चुनौती दी थी।

न्यायमूर्ति एम सत्यनारायणन और न्यायमूर्ति एन शेषायै की खंडपीठ ने कहा कि स्थानांतरण के आदेश को चुनौती केवल स्थानांतरित होने वाले न्यायाधीश द्वारा ही दी जा सकती है और किसी और यह नहीं कर सकता। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता को इस रिट याचिका को बनाए रखने का कोई अधिकार ((लोकस स्टैंडी)‌ नहीं है।

न्यायमूर्ति वी.के. ताहिलारामानी के मेघालय उच्च न्यायालय में स्थानांतरण के प्रस्ताव को प्रभावी करने से रोकने की मांग करते हुए नामांकित एडवोकेट, एम कर्पगम ने एक जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें निषेधाज्ञा की मांग की गई थी। उन्होंने अदालत के समक्ष कहा कि इस स्थानांतरण ने उनके जैसी नवोदित महिला वकीलों के सपनों को हिला दिया है। रिट याचिका में उन्होंने जो मुद्दे उठाए थे, वे इस प्रकार थे।

क्या एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का दूसरे उच्च न्यायालय में दूसरा स्थानांतरण मान्य है? विशेष रूप से वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में?

क्या किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के स्थानांतरण का प्रस्ताव केवल भारत के राष्ट्रपति द्वारा या सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा ही किया जा सकता है?

किसी अन्य उच्च न्यायालय में स्थानांतरण के लिए उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की असहमति हो सकती है या नहीं? यदि हां, तो किसके द्वारा?

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को उनकी सेवानिवृत्ति के ठीक पहले स्थानांतरित किया जा सकता है या नहीं?

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय हस्तांतरणीय है या नहीं?

उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों का पारस्परिक स्थानांतरण किया जा सकता है या नहीं?

हालांकि पीठ ने केवल इस मुद्दे पर विचार किया कि क्या याचिकाकर्ता के पास इस रिट याचिका को बनाए रखने के लिए अधिकार (लोकस स्टैंडी)‌ है? पीठ ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन और अन्य बनाम भारत संघ और एसपी गुप्ता बनाम भारत संघ के फैसले का संदर्भ दिया और निर्णय में किए गए निम्नलिखित टिप्पणियों पर प्रकाश डाला:

स्थानांतरित न्यायाधीश / मुख्य न्यायाधीश के किसी उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में पहले या दूसरे स्थानांतरण के लिए उनकी सहमति की आवश्यकता नहीं है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश पर किए गए किसी भी हस्तांतरण को दंडात्मक नहीं माना जाना चाहिए, और ऐसा स्थानांतरण किसी भी आधार पर चुनौती देने योग्य नहीं है।

सभी नियुक्तियों और स्थानांतरणों में, निर्दिष्ट मानदंडों का पालन किया जाना चाहिए। हालांकि, यह किसी को चुनौती देने का अधिकार प्रदान नहीं करता है।

नियुक्तियों और स्थानांतरण के मामलों में पहले से केवल निर्दिष्ट आधार पर सीमित न्यायिक समीक्षा उपलब्ध है।

इसमें अशोक रेड्डी बनाम भारत सरकार के मामले को भी संदर्भित किया था जिसमें यह कहा गया था कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का स्थानांतरण केवल न्यायाधीशों के मामले- II में संकेतित आधार पर ही उचित हैं और केवल स्थानांतरित होने वाले न्यायाधीश ही स्थानांतरण को चुनौती दे सकते हैं कोई और नहीं। इस जनहित याचिका को खारिज करते हुए, पीठ ने देखा:

"के .आशोक रेड्डी के मामले में (फैसले का हवाला देते हुए) याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए आधारों का पूरा जवाब दिया गया। उक्त निर्णय ने यह भी प्रस्ताव रखा कि एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का स्थानांतरण केवल न्यायाधीशों के मामले- II में संकेतित आधार पर ही उचित है और केवल स्थानांतरित होने वाले न्यायाधीश ही स्थानांतरण को चुनौती दे सकते हैं कोई और नहीं। जैसे, याचिकाकर्ता के पास इस रिट याचिका को बनाए रखने के लिए कोई अधिकार (लोकस स्टैंडी)‌ नहीं है।"



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