'धर्मनिरपेक्षता और भाईचारे के खिलाफ': बौद्ध नेता ने 'वंदे मातरम' के छह-पद वाले वर्शन आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी
बौद्ध एक्टिविस्ट ने केंद्र सरकार के 28 जनवरी और 9 जुलाई, 2026 के आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इन आदेशों में खास मौकों पर 'वंदे मातरम' के छह-पद वाले वर्शन को गाने और बजाने का निर्देश दिया गया। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ये निर्देश धर्मनिरपेक्षता, भाईचारे और उन नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, जो हिंदू धार्मिक मान्यताओं को नहीं मानते हैं।
अनुसूचित जाति के बौद्ध, अंबेडकरवादी एक्टिविस्ट और 'ऑल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज़ एम्प्लॉइज फेडरेशन' (BAMCEF) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष BD बोरकर ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह रिट याचिका दायर की। याचिका में यह घोषणा करने की भी मांग की गई कि किसी भी व्यक्ति को यह गीत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इसे गाना या बजाना अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि गीत के छह-पद वाले वर्शन को थोपना धर्मनिरपेक्षता और भाईचारे का उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता ने कहा:
"एक खास धर्म की खास देवियों की सांप्रदायिक प्रार्थना को भारत का राष्ट्रगीत बनाकर, विवादित आदेश भारत की राजनीतिक व्यवस्था के स्वरूप को 'धर्मनिरपेक्ष गणराज्य' से बदलकर 'धर्म-आधारित शासन' (थियोक्रेसी) में बदल देते हैं।"
उनके अनुसार, इस तरह थोपने से "भारत में सांप्रदायिक विभाजन और संघर्ष हमेशा के लिए गहरा हो जाएगा, क्योंकि इससे अल्पसंख्यक धर्मों - जिसमें याचिकाकर्ता का धर्म (बौद्ध धर्म) भी शामिल है - की धार्मिक और आध्यात्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचेगी।"
तर्क दिया गया कि यह कदम "भाईचारे और धर्मनिरपेक्षता जैसी संविधान की बुनियादी संरचना की विशेषताओं का मजाक उड़ाता है।"
याचिकाकर्ता का तर्क है कि केंद्र ने प्रभावी रूप से 'वंदे मातरम' के दो-पद वाले वर्शन की जगह छह-पद वाली रचना को लागू किया। दो-पद वाला वर्शन आजादी के बाद से पारंपरिक रूप से राष्ट्रीय कार्यक्रमों में गाया जाता रहा है, जबकि छह-पद वाली रचना बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास 'आनंदमठ' में मिलती है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि दो-पद वाला वर्शन, जो 'आनंदमठ' उपन्यास से पहले का है, 1881 में उपन्यास में शामिल किए गए छह-पद वाले वर्शन से अलग है। याचिका के अनुसार, शुरुआती दो पदों में मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन है, जबकि बाकी चार पदों में हिंदू देवियों दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती का आह्वान किया गया।
उनके अनुसार, 'आनंदमठ' एक ऐसा उपन्यास है, जिसमें "मुसलमानों के खिलाफ हिंसक और नफरत भरी बातें" हैं, और गाने के छह-पद वाले वर्शन का इस्तेमाल युद्ध के नारे के तौर पर किया जाता है। महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नेताओं ने सभी छह पदों को अपनाने पर आपत्ति जताई, और टैगोर के सुझाव पर पहले दो पदों को स्वीकार किया गया।
याचिका में कांग्रेस वर्किंग कमेटी के 1937 के एक प्रस्ताव का ज़िक्र किया गया, जिसमें यह सुझाव दिया गया कि राष्ट्रीय समारोहों में 'वंदे मातरम' के केवल पहले दो पद ही गाए जाएं। आज़ादी की लड़ाई के दौरान और आज़ादी के बाद भी इसी बात का पालन किया गया।
इसमें संविधान सभा के 24 जनवरी, 1950 के बयान का भी ज़िक्र है, जब उसके अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि 'वंदे मातरम', जिसने भारत की आज़ादी की लड़ाई में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी, उसे राष्ट्रगान 'जन गण मन' के बराबर सम्मान दिया जाएगा।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि संविधान सभा ने छह-पद वाले वर्शन को नहीं चुना और न ही सभी छह पदों को गाने का निर्देश दिया। उनका कहना है कि दशकों से दो-पद वाले वर्शन का इस्तेमाल किए जाने के कारण इसे एक बाध्यकारी कानूनी परंपरा का दर्जा मिल गया।
Case : BHIMRAO DURYODHAN BORKAR Vs. UNION OF INDIA AND ANOTHER | Diary No. 61620 / 2026