नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) के लिए संशोधित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) ढांचे के तहत, ₹2,000 से अधिक के ट्रांजैक्शन पर शुल्क लगाने के अपने फैसले का बचाव किया।

NPCI ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि व्यापारियों को MDR चार्ज ग्राहकों पर डालने की अनुमति नहीं है। इसके अलावा, NPCI ने कहा है कि UPI एप्लिकेशन प्रोवाइडर, UPI पेमेंट के लिए कोई प्लेटफॉर्म फीस या अन्य चार्ज नहीं लगा सकते।

हलफनामे में कहा गया,

"दूसरी बात, अगर कोई पेयर PSP (पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर) या TPAP (थर्ड-पार्टी एप्लिकेशन प्रोवाइडर) NPCI के इस निर्देश का पालन नहीं करता है कि MDR चार्ज ग्राहकों पर नहीं डाला जाना चाहिए तो यह उनके बीच हुए समझौते (SLA) का उल्लंघन माना जाएगा। ऐसे में संबंधित पेयर PSP या TPAP के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है, जिसमें उनकी UPI मेंबरशिप और सुविधाएं खत्म करना भी शामिल हो सकता है। इसलिए बैंकों और UPI सर्विस प्रोवाइडर को दिया गया यह निर्देश अनिवार्य और बाध्यकारी है। इसे मौजूदा अनुबंधों के जरिए लागू किया जा सकता है। यह कोई महज 'आश्वासन' या सिर्फ नीतिगत बात नहीं है। इसलिए यह आशंका कि ग्राहकों पर अप्रत्यक्ष रूप से बोझ पड़ सकता है, पूरी तरह से निराधार है।"

NPCI ने 3 नवंबर को एक जवाबी हलफनामा दायर किया। यह हलफनामा 'पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007' की धारा 10A में किए गए संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका के जवाब में है। यह संशोधन 'टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) एक्ट, 2026' के जरिए लाया गया। इसके साथ ही वित्त मंत्रालय की अधिसूचना और सितंबर में घोषित संशोधित MDR ढांचे को भी चुनौती दी गई।

बता दें, सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2026 में हलफनामा मांगा था, जिसमें यह स्पष्ट करने को कहा गया था कि यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) के जरिए ₹2,000 से अधिक के ट्रांजैक्शन पर चार्ज लगाने का आधार क्या है।

NPCI ने बताया कि 'व्यक्ति से व्यापारी' (person-to-merchant) के बीच होने वाले लगभग 96% ट्रांजैक्शन पर संशोधित MDR का कोई असर नहीं पड़ेगा। NPCI ने इस आशंका को भी खारिज किया कि MDR चार्ज की वजह से व्यापारी अपनी कीमतें बढ़ा देंगे।

NPCI ने कहा,

"MDR के तहत चार्ज केवल P2M (पर्सन-टू-मर्चेंट) ट्रांजेक्शन के एक छोटे हिस्से, यानी लगभग 4% पर ही लागू होता है, जो 2,000 रुपये से अधिक के हैं। चूंकि यह चार्ज बहुत कम ट्रांजेक्शन पर और एक तय सीमा से अधिक होने पर ही लगता है, इसलिए व्यापारियों के पास अपने सभी ग्राहकों के लिए कीमतें बदलने का कोई खास कारण नहीं बनता है। इसलिए यह आशंका कि MDR फ्रेमवर्क के कारण चुपचाप कीमतें बढ़ा दी जाएंगी, पूरी तरह गलत है।"

NPCI ने स्पष्ट किया कि 'पर्सन-टू-पर्सन' (व्यक्ति से व्यक्ति) ट्रांजेक्शन और P2PM (पर्सन-टू-स्मॉल मर्चेंट) श्रेणी के तहत छोटे व्यापारियों से जुड़े ट्रांजेक्शन पहले की तरह ही मुफ्त रहेंगे। P2PM श्रेणी में वे व्यापारी आते हैं, जिन्हें UPI के जरिए हर महीने 1 लाख रुपये तक का भुगतान प्राप्त होता है।

NPCI के अनुसार, कुल UPI ट्रांजेक्शन में से लगभग 70% 'पर्सन-टू-पर्सन' ट्रांसफर होते हैं, जबकि 'पर्सन-टू-मर्चेंट' ट्रांजेक्शन में से लगभग 96% ट्रांजेक्शन 2,000 रुपये या उससे कम मूल्य के होते हैं। नए फ्रेमवर्क के तहत, इन दोनों श्रेणियों पर कोई MDR नहीं लगेगा।

हलफनामे में कहा गया,

"2,000 रुपये से अधिक के P2M ट्रांजेक्शन पर अधिकतम 0.4% का MDR लगेगा। इसका मतलब यह है कि यह शुल्क व्यापारियों के केवल 4% ट्रांजेक्शन पर ही लागू होगा। बाकी 96% P2M ट्रांजेक्शन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि या तो वे 2,000 रुपये की सीमा से कम हैं, या फिर छोटे व्यापारियों के लिए लागू 'जीरो-MDR' (शून्य MDR) फ्रेमवर्क के दायरे में आते हैं। चूंकि यह चार्ज केवल अधिक मूल्य वाले कुछ चुनिंदा ट्रांजेक्शन पर ही लगता है, इसलिए यह साफ है कि MDR फ्रेमवर्क को इस तरह से तैयार किया गया कि इससे पूरे इकोसिस्टम को बनाए रखने के लिए रेवेन्यू भी जुटाया जा सके। साथ ही UPI के अधिकांश मुफ्त इस्तेमाल पर भी कोई असर न पड़े। गौरतलब है कि MDR की यह 0.4% की अधिकतम सीमा, क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड के लिए अन्य पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर्स द्वारा लगाए जाने वाले चार्ज की तुलना में काफी कम है।"

हलफनामे में आगे कहा गया कि 20 लाख रुपये तक के सालाना टर्नओवर वाले छोटे व्यापारियों के बीच UPI के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष फंड बनाने का प्रस्ताव है। इस फंड के लिए हर इकाई के MDR हिस्से से 5% राशि ली जाएगी (इसमें कुछ खास इंडस्ट्री-प्रोग्राम श्रेणियों को शामिल नहीं किया गया)।

NPCI ने कहा,

"याचिकाकर्ता को डर है कि छोटे व्यापारियों और सड़क किनारे सामान बेचने वालों (स्ट्रीट वेंडर्स) पर इसका अप्रत्यक्ष बोझ पड़ेगा और उनकी परिचालन लागत (ऑपरेशनल कॉस्ट) बढ़ जाएगी। लेकिन, MDR फ्रेमवर्क का मुख्य उद्देश्य ही UPI इकोसिस्टम को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखना है। इसी के तहत यह फ्रेमवर्क इन छोटे व्यापारियों को इस बोझ से बचाने के लिए विशेष प्रयास करता है... एक ऐसा फ्रेमवर्क जो छोटे व्यापारियों को पूरी तरह से इस शुल्क (चार्ज) से बाहर रखता है, और जो इससे होने वाली कमाई का एक हिस्सा उनके डिजिटल समावेश (डिजिटल इंक्लूजन) को जारी रखने के लिए देता है, उसे यह नहीं कहा जा सकता कि वह उसी वर्ग को डिजिटल दायरे से बाहर करने (डिजिटल एक्सक्लूजन) का काम कर रहा है।"

हालांकि, सर्कुलर में शुरुआत में इसे 15 अक्टूबर से लागू करने की योजना थी, लेकिन NPCI ने बताया है कि इस फ्रेमवर्क को लागू करने का काम फिलहाल टाल दिया गया।

NPCI का तर्क है कि MDR कमर्शियल चार्ज है, जो UPI इकोसिस्टम में शामिल पक्षों के बीच बांटा जाता है। यह न तो कोई टैक्स है और न ही सरकार द्वारा वसूला जाने वाला कोई चार्ज। साथ ही NPCI ने 'पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट' की धारा 20 और 21 के तहत पेमेंट-सिस्टम चार्ज तय करने के अपने कानूनी अधिकार का भी बचाव किया।

अनुच्छेद 12 के तहत NPCI 'राज्य' (State) नहीं: जवाब

NPCI ने याचिका की स्वीकार्यता पर शुरुआती आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि अनुच्छेद 12 के तहत NPCI न तो 'राज्य' है और न ही 'राज्य प्राधिकरण' (State Authority)। इसलिए अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट के रिट अधिकार क्षेत्र (Writ Jurisdiction) में इसके कार्यों को चुनौती नहीं दी जा सकती।

हलफनामे में कहा गया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहा है कि NPCI के खिलाफ यह याचिका या मांगी गई राहतें कैसे लागू हो सकती हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि अनुच्छेद 14 और 19(1)(g) के तहत मिलने वाले संवैधानिक अधिकार केवल उन्हीं संस्थाओं के खिलाफ लागू किए जा सकते हैं, जो अनुच्छेद 12 में दी गई 'राज्य' की परिभाषा के दायरे में आती हैं।

'पेमेंट सिस्टम्स एक्ट' के तहत NPCI को चार्ज तय करने का अधिकार: जवाब

NPCI ने बताया कि RBI ने अगस्त 2016 में उसे 'पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट' की धारा 4 के तहत एक पेमेंट-सिस्टम प्रोवाइडर के रूप में UPI संचालित करने के लिए अधिकृत किया था। NPCI का तर्क है कि इस एक्ट की धारा 20 और 21 के तहत उसे पेमेंट सिस्टम से जुड़ी शर्तें और नियम तय करने तथा उनका खुलासा करने का अधिकार है, जिसमें लागू होने वाले चार्ज भी शामिल हैं।

जवाब (Counter Affidavit) के अनुसार, धारा 10A में किया गया संशोधन अपने आप में MDR नहीं लगाता है, और न ही यह कोई चार्ज लगाने या उसकी दर तय करने की शक्ति देता है। इसके बजाय, यह उन इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट मोड को स्पष्ट करता है, जिन्हें चार्ज के मामले में कानूनी सुरक्षा (Statutory Protection) प्राप्त है। अन्य पेमेंट मोड के लिए शुल्क तय करने का काम कानूनी ढांचे के भीतर अधिकृत पेमेंट-सिस्टम ऑपरेटरों पर छोड़ दिया गया।

केंद्र सरकार ने 14 सितंबर के अपने नोटिफिकेशन के जरिए यह स्पष्ट किया कि बिना किसी मौद्रिक सीमा (Monetary Ceiling) वाले RuPay डेबिट कार्ड ट्रांजेक्शन और 2,000 रुपये तक के UPI ट्रांजेक्शन, धारा 10A के तहत 'नो-चार्ज' (शुल्क-मुक्त) सुरक्षा के दायरे में आते हैं। संशोधन और अधिसूचना के बाद NPCI ने 15 सितंबर 2026 को एक सर्कुलर जारी किया। इसमें 2,000 रुपये से अधिक के UPI 'पर्सन-टू-मर्चेंट' (P2M) ट्रांजेक्शन के लिए संशोधित MDR फ्रेमवर्क पेश किया गया।

UPI की सस्टेनेबिलिटी (स्थायित्व) के लिए MDR फ्रेमवर्क जरूरी: NPCI का तर्क

NPCI का तर्क है कि UPI इकोसिस्टम को लंबे समय तक बनाए रखने, पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश को बढ़ावा देने, और साइबर सुरक्षा व धोखाधड़ी रोकने के लिए यह फ्रेमवर्क जरूरी है।

जवाब में दाखिल हलफनामे में कहा गया कि UPI के जरिए हर महीने अरबों ट्रांजेक्शन होते हैं। संशोधित MDR का मकसद इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने, इनोवेशन, साइबर सुरक्षा और ग्राहक सेवाओं में निवेश को सपोर्ट करना है।

NPCI ने वित्त मामलों की संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee on Finance) की सिफारिशों का हवाला दिया है। समिति ने UPI के बढ़ते परिचालन खर्च (Operational Expenditure) और एक टिकाऊ फंडिंग मॉडल की जरूरत पर बात की थी। NPCI का कहना है कि 'जीरो-MDR' व्यवस्था के कारण लागत का एक बड़ा अंतर (Structural Cost Gap) पैदा हो गया, जिससे डिजिटल पेमेंट के विस्तार और सुरक्षा के लिए जरूरी निवेश में रुकावट आई।

NPCI के अनुसार, इस संशोधित फ्रेमवर्क को इस तरह तैयार किया गया कि इससे कम मूल्य वाले ट्रांजेक्शन और छोटे व्यापारियों को सुरक्षा मिले। साथ ही पेमेंट इकोसिस्टम अपना परिचालन खर्च भी निकाल सके।

हलफनामे में संसदीय स्थायी समिति की 2026-27 के लिए 'अनुदान की मांगों' (Demands for Grants) पर आई 32वीं रिपोर्ट का जिक्र है। इसमें बताया गया कि 'जीरो-MDR' व्यवस्था की लागत की भरपाई के लिए आवंटित 2,000 करोड़ रुपये का बजट, इंडस्ट्री की वास्तविक लागत का केवल 11% और संभावित MDR कलेक्शन का 14% ही कवर कर पाया।

समिति ने सिफारिश की थी कि वित्तीय सेवा विभाग (Department of Financial Services) आत्मनिर्भर, 'टियर्ड' (स्तरित) रेवेन्यू मॉडल पर विचार करे, ताकि पेमेंट इकोसिस्टम लंबे समय तक आर्थिक रूप से टिकाऊ बना रहे।

NPCI ने वित्त मंत्रालय द्वारा समिति को दिए गए जवाब का भी हवाला दिया। इसमें बताया गया कि 2026-27 के लिए 2,000 करोड़ रुपये के बजट आवंटन के मुकाबले, इंडस्ट्री का परिचालन खर्च 20,700 करोड़ रुपये होने का अनुमान है।

संशोधित MDR फ्रेमवर्क व्यापारियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता: जवाब

NPCI ने अनुच्छेद 14 और 19(1)(g) के तहत इस फ्रेमवर्क को दी गई चुनौती को खारिज किया। NPCI का तर्क है कि ट्रांजैक्शन वैल्यू, व्यापारी की श्रेणी और व्यापारी के आकार के आधार पर किया गया वर्गीकरण तार्किक अंतर पर आधारित है। साथ ही इसका UPI इकोसिस्टम की निरंतरता, सुरक्षा और समावेशिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक तर्कसंगत संबंध है।

NPCI ने कहा कि यह फ्रेमवर्क न तो मनमाना है और न ही व्यापार या कारोबार करने के अधिकार पर कोई अनुचित प्रतिबंध लगाता है।

NPCI ने इस बात पर जोर दिया है कि यह चार्ज बहुत कम मामलों में लगता है, और अधिकांश UPI ट्रांजैक्शन इस फ्रेमवर्क से प्रभावित नहीं होते हैं। NPCI का कहना है कि यह फ्रेमवर्क UPI की दीर्घकालिक निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए व्यावसायिक रूप से समझदारी भरा तरीका है, जो उपभोक्ताओं, छोटे व्यापारियों और अन्य हितधारकों के हितों की भी रक्षा करता है।

Case Title : Anjan Datta v. Union of India

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