न्यायालय की अवमानना : आवारा कुत्तों के मामले में टिप्पणी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मेनका गांधी को फटकारा

Update: 2026-01-21 05:39 GMT

आवारा कुत्तों से जुड़े स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि उनके द्वारा जजों के खिलाफ की गई टिप्पणियां प्रथम दृष्टया न्यायालय की अवमानना के दायरे में आती हैं।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस मामले में कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं कर रहा है, जिसे पीठ ने अपनी उदारता करार दिया।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ इस मामले की पांचवें दिन सुनवाई कर रही थी। सुनवाई शुरू होते ही एडवोकेट प्रशांत भूषण ने पिछली तारीख पर पीठ द्वारा की गई कुछ मौखिक टिप्पणियों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों को कई बार गलत तरीके से समझ लिया जाता है।

इस पर जस्टिस मेहता ने कहा कि ये टिप्पणियां कुत्तों के पक्षकारों की ओर से रखी गई “अव्यावहारिक दलीलों” के संदर्भ में की गईं। भूषण ने जवाब दिया कि कभी-कभी कोर्ट की टिप्पणियों के दूरगामी परिणाम होते हैं और मीडिया रिपोर्टिंग के कारण उनका अलग अर्थ निकल जाता है।

जस्टिस मेहता ने स्पष्ट किया कि कुत्तों को खाना खिलाने वालों की जिम्मेदारी तय करने संबंधी पीठ की टिप्पणी किसी भी तरह से व्यंग्यात्मक नहीं थी। उन्होंने कहा कि पीठ इस विषय पर पूरी तरह गंभीर है।

इसी दौरान, मेनका गांधी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट राजू रामचंद्रन ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि चूंकि कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है, इसलिए बार और बेंच दोनों को सतर्क रहना चाहिए। इस पर जस्टिस मेहता ने कहा कि पीठ इस बात से अवगत है और इसी कारण संयम बरत रही है।

कुछ देर बाद जस्टिस विक्रम नाथ ने रामचंद्रन से कहा कि जब वह कोर्ट से सतर्कता की अपेक्षा कर रहे हैं तो क्या उन्होंने अपनी मुवक्किल द्वारा दिए गए बयानों को देखा है। इस पर रामचंद्रन ने कहा कि जैसे वह अजमल कसाब के मामले में पेश हो सकते थे, वैसे ही इस मामले में भी पेश हो सकते हैं।

इस पर जस्टिस नाथ ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि मेनका गांधी ने न्यायालय की अवमानना की। कोर्ट ने केवल अपनी उदारता के चलते कोई कार्रवाई नहीं की है। उन्होंने कहा कि उनके बयानों और सार्वजनिक व्यवहार को देखा जाना चाहिए।

इसके बाद सीनियर एडवोकेट रामचंद्रन ने दलील दी कि आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए पशु जन्म नियंत्रण नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि रेबीज उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना में पहले ही प्रमुख बाधाओं और सभी हितधारकों की भूमिका तय की जा चुकी है, लेकिन 30 से अधिक राज्यों ने अब तक अपनी कार्य योजना नहीं बनाई।

जस्टिस मेहता ने इस पर सवाल किया कि जब मेनका गांधी स्वयं मंत्री रह चुकी हैं और पशु अधिकारों की सक्रिय समर्थक हैं तो उनकी याचिका में बजटीय प्रावधानों और उनके योगदान का कोई उल्लेख क्यों नहीं है। इस पर रामचंद्रन ने कहा कि वह इस प्रश्न का मौखिक उत्तर नहीं दे सकते।

इसके बाद खंडपीठ ने कुत्तों के पक्षकारों और कुत्तों के हमलों से पीड़ित पक्षों के वकीलों की दलीलें सुनीं।

मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी को दोपहर 2 बजे होगी।

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