मद्रास हाईकोर्ट ने स्टेट बार काउंसिल को जरूरतमंद अधिवक्ताओं को 'मुश्किल दिनों में' अंतरिम राहत प्रदान करने के लिए नियमों में संशोधन करने का दिया निर्देश

Update: 2020-06-17 10:17 GMT

मद्रास हाईकोर्ट ने मंगलवार को सिफारिश की है कि स्टेट बार काउंसिल जल्द से जल्द अपने विनियमों में संशोधन करके उस प्रावधान को जोड़े,जिसके जरिए ''इन मुश्किल भरे दिनों में जरूरतमंद अधिवक्ताओं को अंतरिम भुगतान''किया जा सकें।

डिवीजन बेंच ने इस मामले में एक वरिष्ठ अधिवक्ता की तरफ से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करने के बाद यह आदेश दिया है। इस याचिका में ''सामान्य रूप से एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया था और जो वर्तमान महामारी जैसी स्थिति में विशेष महत्व रखता है क्योंकि इस कठिनाई के समय में स्व-नियोजित या स्व-रोजगार करने वाले पेशेवरों को आजीविका/आय के स्रोत के मामले में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।''

याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि प्रतिवादी बार काउंसिल ऑफ तमिलनाडु और पुडुचेरी (बीसीटीएनपी) और तमिलनाडु राज्य को निर्देश दिया जाए कि वह एडवोकेट्स और पंजीकृत एडवोकेट क्लर्क को क्रमशः 50,000 रुप्ये और 25000 रुपये अंतरिम राहत के तौर पर प्रदान करें।

यह प्रार्थना इस आधार पर की गई थी कि अधिवक्ताओं व अधिवक्ता-लिपिक को दी जाने वाली पूर्वोक्त राशियाँ, बीसी के पास उपलब्ध कल्याणकारी फंड में से कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में उनके लाभ के लिए निर्धारित राशि या उनको देने के लिए रखी गई राशि का एक हिस्सा मात्र होंगी।

कोर्ट ने कहा कि

'' दुर्भाग्य से हम इस संबंध में याचिकाकर्ता की प्रार्थना को सीधे स्वीकार करने की स्थिति में नहीं हैं। लेकिन हम प्रतिवादियों को निर्देश दे रहे हैं कि वह हमारी पूर्वोक्त सिफारिश पर उचित भावना के साथ विचार करें। वहीं जल्द से जल्द इस मामले में सकारात्मक व आवश्यक कारवाई करें।''

बीसीटीएनपी ने पीठ के समक्ष दलील दी थी कि याचिकाकर्ता की प्रार्थना को तभी मंजूर किया जा सकता है,जब नियमों में एक ऐसा विशिष्ट संशोधन किया जाए,जिसके तहत अंतरिम उपाय के रूप में फंड को बांटा जा सकें।

आज की तारीख में उपस्थित नियमों में सिर्फ विशिष्ट परिस्थितियों को निर्धारित किया गया है और जिनके अनुसार कोई घटना होने पर संबंधित व्यक्ति को ही भुगतान किया जा सकता है। नियमों में अंतरिम भुगतान का कोई प्रावधान नहीं है।

पीठ ने कहा कि-

''अफसोस की बात है कि बीसीटीएनपी अपनी जगह सही है। हालांकि कई बार विशेष परिस्थितियां आ जाती है,जैसे कि वर्तमान के हालात हैं। परंतु इसके लिए ट्रस्टियों को यह अधिकार नहीं दिया गया है कि वह अपने विवेक से अंतरिम भुगतान कर सकें। इसलिए वह ऐसा नहीं कर पा रहे हैं।

हालांकि, बीसीआई विनियम 41 (3) के तहत यह अनुमति दी गई है कि राज्य की बार काउंसिल आॅफ इंडिया एडवोकेट्स वेलफेयर फंड कमेटी द्वारा एकत्र की गई कुल राशि का 80 प्रतिशत हिस्सा ,संबंधित राज्य बार काउंसिल द्वारा प्रायोजित कल्याणकारी योजनाओं के संबंध में अधिवक्ताओं के कल्याण के लिए उपयोग किया जाता है।

इसलिए राज्य के नियमों में भुगतान के लिए व्यवस्था प्रदान करने वाला विशिष्ट और उपयुक्त संशोधन/प्रावधान किया जाना चाहिए। बीसीआई विनियमों में एक ऐसी स्थिति की परिकल्पना की कई है जहां राज्य अधिवक्ताओं के लिए कल्याणकारी योजना तैयार कर सकते हैं और इस संबंध में बीसीआई की सहमति प्राप्त करने के बाद एकत्र की गई राशि का उपयोग कर सकते हैं।''

न्यायालय ने कहा कि विनियमन 44ए (6) के तहत यह प्रावधान है कि राज्य बार काउंसिल इस संबंध में बनाई गई योजनाओं को बीसीआई के साथ मिलकर और बीसीआई की अनिवार्य निगरानी के अधीन लागू कर सकता है-

''राज्य के नियमों में एक विशिष्ट और सक्षम नियम की अनुपस्थिति हालांकि एक तत्काल बाधा है। इसलिए हमारी सिफारिश है कि जल्द से जल्द एक संशोधन के माध्यम से इस तरह के नियम को सम्मिलित किया जाना चाहिए। ताकि इस कठिन समय में जरूरतमंद अधिवक्ताओं को अंतरिम पे-आउट या अंतरिम राहत का भुगतान किया जा सके।''

बीसीआई विनियम यह प्रदान करते हैं कि स्टेट बार काउंसिल के एक सदस्यों से राशि एकत्रित करके उसे बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा बनाई गई संबंधित राज्य के लिए बनाई गई एडवोकेट्स कल्याण निधि में जमा कराया जा सकता है। इस फंड में जो राशि एकत्रित होती है,उसमें से हर महीने बीस प्रतिशत राशि बार काउंसिल आॅफ इंडिया के खाते में स्थानांतरित हो जाती है जो बार काउंसिल ऑफ इंडिया एडवोकेट्स वेल्फेयर फंड के हिस्से के तौर पर मानी जाती है। नियम 41 (3) में कहा गया है कि शेष 80 प्रतिशत राशि को स्टेट बार काउंसिल ऑफ इंडिया एडवोकेट्स वेलफेयर फंड में रखा जाएगा। जिसका उपयोग संबंधित स्टेट बार काउंसिल के सदस्य होने के नाते वकीलों के कल्याण के लिए किया जा सकता है। यह फंड संबंधित राज्य के लिए अधिवक्ता कल्याण समिति द्वारा प्रशासित किया जाता है, जो बीसीआई की उचित निगरानी के लिए वार्षिक रिटर्न जमा करवाते हैं।

न्यायालय के समक्ष बीसीटीएनपी ने दलील दी कि उनको सदस्य अधिवक्ताओं के सामने आई समस्याएं दिख रही हैं और जरूरतमं अधिवक्ताओं को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए विभिन्न उपाय कर रहे हैं।

वित्तीय सहायता का प्रावधान करने के लिए तमिलनाडु और पुदुचेरी के मुख्यमंत्रियों से भी अनुरोध किया गया है। जरूरतमंड अधिवक्ताओं को आगे भी मदद करने के लिए वरिष्ठ अधिवक्ताओं और बार के अन्य सदस्यों से भी योगदान मांगा जा रहा है। इसके लिए हाईकोर्ट में स्थित इंडियन बैंक की शाखा में एक विशिष्ट राहत कोष खाता खोला गया है। यह भी दलील दी गई थी कि राज्य बार काउंसिल ने जरूरतमंद अधिवक्ताओं से आवेदन भी मंगवाए थे। ऐसी सहायता पाने के लिए निर्धारित शर्तों पूरी होने के बाद उनको वित्तीय सहायता दे दी जाएगी। इसी उद्देश्य के लिए एक एंड्रॉइड मोबाइल एप्लिकेशन भी बनाई गई थी। 20 अप्रैल तक बीसीटीएनपी को 16,825 आवेदन प्राप्त हुए थे,जिनमें से 15,970 मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से और शेष पोस्ट के माध्यम से प्राप्त हुए हैं। सभी आवेदनों की जांच की जा रही है।

23 अप्रैल को कल्याण कोष में पहले से उपलब्ध शेष राशि व प्राप्त योगदान को मिलाकर कुल राशि 1,23,65,113 रुपये थी। बीसीटीएन एडवोकेट्स रिलीफ फंड में उपलब्ध कुल राशि 5 करोड़ रुपये थी। वर्तमान में, बीसीटीएनपी के सदस्यों की संख्या 65,000 है।

उनको एंड्रॉइड मोबाइल ऐप के माध्यम से करीब 16,000 आवेदन और पोस्ट के जरिए से 1059 आवेदन प्राप्त हुए थे, जिनमें से 12,215 सहायता प्राप्त करने के योग्य पाए गए थे। हालांकि बीसीटीएनपी द्वारा राज्य सरकार को किया अनुरोध फलदायी रहा। जिसके कारण उनको एक प्रारंभिक अनुदान प्राप्त हुआ। जिसमें से 18 मई को 12 हजार अधिवक्ताओं को चार-चार हजार रुपए की सहायता दे भी दी गई। वहीं अतिरिक्त धन के लिए बीसीटीएनपी द्वारा किए गए अनुरोध पर अभी राज्य सरकार से कोई जवाब नहीं आया है।

न्यायालय ने इस बात की सराहना करते हुए कहा कि जब उत्तर प्रदेश एडवोकेट्स वेलफेयर फंड एक्ट के तहत गठित ट्रस्टी कमेटी की देनदारियों उनके पास उपलब्ध फंड से ज्यादा हो गई थी तो इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विशेष रूप से यूपी एडवोकेट्स वेलफेयर फंड एक्ट 1974 की धारा 5 को लागू किया था और कहा था कि समिति अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए अधिवक्ताओं को सहायता पहुंचाने के लिए उधार या लोन भी ले सकती है। कोर्ट ने कहा कि,''तमिलनाडु एडवोकेट्स वेलफेयर फंड एक्ट, 1987 की धारा 10 में भी इसी तरह का प्रावधान है।''

पीठ का मानना था कि बीसीटीएनपी को इस मामले में और अधिक प्रयास करने की जरूरत है। वह प्रत्येक अधिवक्ता को मात्र 40,000 रुपये का भुगतान करके संतुष्ट नहीं हो सकती है। जबकि इस तथ्य पर ध्यान दिया जाना जरूरी है कि अभी क्लर्कों को कोई भी भुगतान नहीं किया गया है।

अदालत ने कहा कि-

''हालांकि अंतरिम भुगतान प्रदान करने के लिए अब तक कोई प्रावधान उपलब्ध नहीं है। परंतु वर्तमान परिस्थितियों में अधिनियम/ प्रासंगिक नियमों के प्रावधानों में तत्काल संशोधन की जरूरत है ताकि बीसीटीएनपी ट्रस्ट में रखे गए धन के कुछ हिस्से को अधिवक्ताओं के कल्याण कोष में एक अंतरिम उपाय के रूप में ड़ाल सकें।''

यह कहते हुए कि ''यहां उठाया गया मुद्दा अभी जारी रहेगा और उस पर हमारी निगरानी की जरूरत है'' कोर्ट ने अपने निर्देशों के अनुपालन के लिए इस मामले की सुनवाई एक जुलाई तक टाल दी है।  


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