चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत ने सोमवार को इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में रुकावट डालने वाले विवादों को सुलझाने के लिए "रेट्रोस्पेक्टिव जस्टिस" (घटना के बाद मिलने वाला न्याय) से हटकर "प्रिवेंटिव जस्टिस" (विवादों को पहले ही रोकने वाला न्याय) की ओर बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रोजेक्ट्स आर्बिट्रेशन या अपील की लंबी प्रक्रियाओं का इंतज़ार नहीं कर सकते।

उन्होंने कहा,

"इसलिए हमारे इंफ्रास्ट्रक्चर इकोसिस्टम को 'रेट्रोस्पेक्टिव जस्टिस' से 'प्रिवेंटिव जस्टिस' की ओर बढ़ने की ज़रूरत है। यानी प्रोजेक्ट में रुकावट आने के बाद सवाल उठाने के बजाय, कॉन्ट्रैक्ट और संस्थागत ढांचे को इस तरह से डिज़ाइन किया जाए कि बातचीत और विवाद-निवारण तंत्र के ज़रिए असहमति की पहचान और समाधान पहले ही हो जाए ताकि वे बड़े विवाद न बनें। आखिरकार, विवाद सुलझाने वाले तंत्र की सबसे बड़ी तारीफ़ यह नहीं है कि उसने कितने विवाद सुलझाए, बल्कि यह है कि जिस प्रोजेक्ट के लिए वह काम कर रहा था, उसे उस तंत्र का इस्तेमाल करने की ज़रूरत ही कितनी कम पड़ी।"

नई दिल्ली में FIDIC ग्लोबल इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्फ्रेंस 2026 को संबोधित करते हुए CJI ने ज़ोर दिया कि हालांकि अदालतें और आर्बिट्रेशन प्रक्रियाएं अहम भूमिका निभाती रहेंगी, लेकिन कानूनी व्यवस्था को विवादों को शुरू होने से रोकने पर भी ध्यान देना चाहिए।

उन्होंने ज़ोर दिया कि अदालतें "कानूनी वैधता और उसे लागू करने की अंतिम गारंटी" होती हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि औपचारिक प्रक्रियाओं के दौरान विवादों के निपटारे के इंतज़ार में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को रोका नहीं जा सकता।

उन्होंने कहा,

"लेकिन मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि कानूनी व्यवस्था को अपनी सफलता केवल इस आधार पर नहीं आंकनी चाहिए कि वह विवाद पैदा होने के बाद उन्हें कितनी प्रभावी ढंग से सुलझाती है; उसे यह भी देखना चाहिए कि प्रोजेक्ट से जुड़ी संस्थाएं उन विवादों को पैदा होने से रोकने में कितनी प्रभावी हैं। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि आर्बिट्रेशन चलने के दौरान किसी पुल का निर्माण नहीं रोका जा सकता; हाईवे अपील की प्रक्रिया पूरी होने का इंतज़ार नहीं कर सकता। कोई पावर प्रोजेक्ट 'फोर्स मेज्योर' (अप्रत्याशित घटना) क्लॉज़ के अर्थ पर पार्टियों की बहस के दौरान अपने आर्थिक मक़सद को सस्पेंड नहीं कर सकता।"

CJI ने इस बात पर ज़ोर दिया कि 'कानून का शासन' (Rule of Law) केवल गलती होने के बाद अदालत द्वारा उसे सुधारने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मतलब ऐसे कॉन्ट्रैक्ट और संस्थाएं बनाना भी है, जो उम्मीदों को स्पष्ट करें, अधिकारों को सही ढंग से परिभाषित करें, जोखिमों का उचित बंटवारा करें और असहमति को सुलझाने के लिए एक विश्वसनीय और समय पर समाधान का रास्ता दें।

उन्होंने कहा,

"इस अर्थ में 'कानून का शासन' इंफ्रास्ट्रक्चर डिलीवरी के ढांचे का ही हिस्सा है - यह हर कॉन्ट्रैक्ट, जोखिम के हर बंटवारे और प्रोजेक्ट द्वारा अपनी असहमति को सुलझाने के लिए बनाए गए हर तंत्र में मौजूद होता है।"

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि तरीका बदलना चाहिए—"प्रोजेक्ट में रुकावट आने के बाद सवाल उठाने के बजाय, कॉन्ट्रैक्ट और संस्थागत ढांचा ऐसा बनाया जाए जिससे बातचीत और विवाद से बचने के तरीकों के ज़रिए असहमति की पहचान की जा सके और विवाद बनने से पहले ही उन्हें सुलझाया जा सके।"

CJI ने जोखिमों को उस पक्ष को सौंपने के महत्व पर भी ज़ोर दिया, जो उन्हें संभालने के लिए सबसे उपयुक्त हो। उन्होंने कहा कि इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में ज़मीन की अप्रत्याशित स्थितियां, नियमों में बदलाव और ऐसी परिस्थितियां आ सकती हैं जो संबंधित पक्षों के नियंत्रण से बाहर हों।

उन्होंने कहा कि एक अच्छी तरह से तैयार किए गए कॉन्ट्रैक्ट में इस बात की साझा समझ होनी चाहिए कि जब प्रोजेक्ट में ऐसी परिस्थितियां आएं जिनकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी, तो संबंधित पक्ष कैसे प्रतिक्रिया देंगे।

उन्होंने कहा,

"जब जोखिम का बंटवारा गलत होता है तो नतीजे सबको पता होते हैं। कॉन्ट्रैक्टर खुद को बचाने के लिए कीमतें ज़्यादा रखते हैं; सरकारों को ऐसे जोखिम उठाने पड़ते हैं, जिन्हें उठाने के लिए वे सबसे उपयुक्त नहीं थीं। आखिर में संबंधित पक्ष आर्बिट्रेशन या कोर्ट तक पहुंच जाते हैं। इसलिए एक अच्छी तरह से तैयार किए गए कॉन्ट्रैक्ट में सिर्फ़ कमर्शियल सौदे का ब्यौरा ही नहीं होना चाहिए; बल्कि उसमें इस बात की साझा समझ भी होनी चाहिए कि जब प्रोजेक्ट में ऐसी परिस्थितियां आएं, जिनकी किसी भी पक्ष ने उम्मीद नहीं की थी, तो वे कैसे प्रतिक्रिया देंगे।"

CJI ने भारत के एक बड़े शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के शुरुआती सालों का ज़िक्र किया, जहां इंजीनियरों और कॉन्ट्रैक्टर्स को साइट लेवल पर ही कुछ दिनों के अंदर मतभेदों को सुलझाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था ताकि वे औपचारिक दावे न बन जाएं। उन्होंने कहा कि यह प्रोजेक्ट तय समय से पहले पूरा हुआ और दूसरी जगहों पर इसी तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की तुलना में इसमें बहुत कम कानूनी विवाद हुए।

उन्होंने कहा कि इस तरह के नज़रिए से पता चलता है कि विवादों को सुलझाना किसी "असफल प्रोजेक्ट के लिए इमरजेंसी एग्ज़िट" के बजाय सफल प्रोजेक्ट के सामान्य कामकाज का हिस्सा बन सकता है।

CJI ने इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्ट्रैक्ट्स में ज़्यादा स्टैंडर्डाइज़ेशन (मानकीकरण) की भी वकालत की। उन्होंने कहा कि इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अब अलग-अलग देशों में फैली पूंजी, इंजीनियरिंग विशेषज्ञता, निर्माण क्षमता और एसेट्स शामिल होते हैं। उन्होंने कहा कि अगर पेमेंट, बदलाव, समय बढ़ाने, अप्रत्याशित स्थितियों और विवाद समाधान से जुड़े प्रावधान हर प्रोजेक्ट के लिए नए सिरे से तय किए जाते हैं, तो इससे अनावश्यक अनिश्चितता पैदा होती है।

हालांकि, CJI ने साफ़ किया कि वह हर प्रोजेक्ट और अधिकार क्षेत्र के लिए एक ही तरह के कॉन्ट्रैक्ट की वकालत नहीं कर रहे थे, क्योंकि स्थानीय कानून, स्थानीय क्षमता और स्थानीय परिस्थितियाँ मायने रखती रहेंगी।

उन्होंने कहा,

"इस संदर्भ में स्टैंडर्डाइज़ेशन का मतलब है कि इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्ट्रैक्ट का बुनियादी ढांचा जाना-पहचाना हो। साथ ही किसी खास प्रोजेक्ट की वास्तविकताओं के लिए भी गुंजाइश हो। इससे भारतीय कॉन्ट्रैक्टर, यूरोपीय लेंडर, अफ़्रीकी सरकार और एशियाई कंसल्टेंट को एक साझा भाषा मिलती है, जिसमें जोखिम, ज़िम्मेदारी और समाधान का मतलब लगभग एक ही होता है, चाहे प्रोजेक्ट कहीं भी हो।"

CJI ने ज़ोर दिया कि बार-बार होने वाले विवादों से सीखने में कानूनी पेशे की भूमिका है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि अगर बदलाव, पेमेंट, समय बढ़ाने या साइट की बदली हुई स्थितियों को लेकर बार-बार विवाद होते हैं तो वकीलों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या भविष्य के प्रोजेक्ट्स के लिए कॉन्ट्रैक्ट को अलग तरह से तैयार किया जा सकता है।

भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार की बात करते हुए CJI ने ज़ोर दिया,

"हमारा मकसद सिर्फ़ ज़्यादा निर्माण करना नहीं हो सकता। हमारा मकसद तेज़ी से, ज़्यादा मज़बूती से, ज़्यादा टिकाऊ और ज़्यादा उत्पादक ढंग से निर्माण करना होना चाहिए। इस मकसद को पूरा करने के लिए विश्व-स्तरीय इंजीनियरिंग और इनोवेटिव फाइनेंसिंग ज़रूरी है, लेकिन वे काफ़ी नहीं हैं। हमें ऐसे कॉन्ट्रैक्ट्स की भी ज़रूरत है, जो टकराव के बजाय भरोसा पैदा करें, ऐसे प्रोक्योरमेंट सिस्टम की, जो सिर्फ़ कागज़ पर सबसे कम कीमत के बजाय असली वैल्यू को महत्व दें। ऐसे विवाद समाधान सिस्टम की जो प्रोजेक्ट की ज़रूरत के हिसाब से तेज़ी से मतभेदों को सुलझाएँ।"

CJI ने सरकार, इंडस्ट्री और कानूनी पेशे से जुड़े लोगों से कहा कि वे ज़िम्मेदारियों को साफ़ करने, जोखिम का सही बंटवारा करने, समझदारी से स्टैंडर्ड तय करने, विवादों को शुरू में ही टालने और अगर विवाद न टलें, तो उन्हें तेज़ी से और निष्पक्ष रूप से सुलझाने पर ध्यान दें।

उन्होंने कहा,

"ये सिर्फ़ कॉन्ट्रैक्ट की बारीक शर्तों तक सीमित कानूनी पेचीदगियां नहीं हैं। वास्तव में, ये अच्छे गवर्नेंस के ज़रिया हैं।"

अपनी बात खत्म करते हुए CJI ने ज़ोर दिया कि 'कानून का शासन' (Rule of Law) सिर्फ़ गलतियों को सुधारने के बारे में नहीं है, बल्कि ऐसी स्थितियां बनाने के बारे में भी है, जिनसे सब कुछ सही ढंग से हो सके।

उन्होंने आगे कहा,

"इसलिए सफलता का असली पैमाना यह नहीं है कि हम कितनी तेज़ी से विवाद सुलझाते हैं, बल्कि यह है कि हम प्रोजेक्ट्स को कितनी अच्छी तरह से डिज़ाइन करते हैं ताकि विवाद कम-से-कम हों।"

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