सुप्रीम कोर्ट ने कल्याण के शास्त्री नगर अस्पताल में डॉक्टरों के साथ कथित मारपीट के मामले में शिवसेना पार्षद रमेश सुख्या म्हात्रे की जमानत को लेकर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि अस्पताल के भीतर डॉक्टरों पर हमला करने की घटनाओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ मंगलवार को म्हात्रे की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा जमानत के दौरान लगाई गई कड़ी शर्तों को चुनौती दी।

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि डॉक्टरों पर हमला करने वाले लोगों को जमानत नहीं मिलनी चाहिए।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

“ऐसे लोगों को जमानत नहीं मिलनी चाहिए। उन्हें मेडिकल समुदाय का सम्मान नहीं है। जब कोई भीड़ हमला करती है तो उसके मानसिक आघात की कल्पना कीजिए। आप अस्पताल के अंदर जाकर किसी भी व्यक्ति को मारेंगे?”

म्हात्रे की ओर से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने जमानत देते समय उन पर अत्यधिक कठोर शर्तें लगाईं। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या अदालत आरोपपत्र 10 दिनों के भीतर दाखिल करने का निर्देश दे सकती है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह बॉम्बे हाईकोर्ट का वह शुरुआती आदेश बरकरार रखने की ओर बढ़ रहा है, जिसके जरिए निचली अदालत से मिली जमानत पर रोक लगाई।

जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि घटना का स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई करने का हाईकोर्ट का फैसला पूरी तरह उचित है।

जब रोहतगी ने कहा कि म्हात्रे की डॉक्टरों से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी तो कोर्ट ने कहा कि घटना का वीडियो पहले ही सार्वजनिक हो चुका है।

महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश एडवोकेट सिद्धार्थ धर्माधिकारी ने कोर्ट को बताया कि राज्य म्हात्रे को दी गई जमानत रद्द कराने के लिए याचिका दायर करने जा रहा है। भारतीय चिकित्सा संघ की ओर से एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड प्रभास बजाज भी कार्यवाही में शामिल हुए और जमानत का विरोध किया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह राज्य सरकार की ओर से दायर होने वाली जमानत रद्द करने की याचिका का इंतजार करेगा।

मामले को अगली सुनवाई के लिए सोमवार को सूचीबद्ध किया गया।

बता दें, म्हात्रे ने बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की गई कार्यवाही में 18 जुलाई और 7 अगस्त 2026 को पारित दोनों आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। मामला कल्याण डोंबिवली नगर निगम के कल्याण स्थित शास्त्री नगर सामान्य अस्पताल में डॉक्टरों के साथ हुई कथित मारपीट से जुड़ा है।

मामला 6 जुलाई की घटना का है। याचिका के अनुसार, नौ महीने की गर्भवती एक महिला प्रसव पीड़ा से जूझ रही थी और कथित तौर पर कई घंटे तक उसे अस्पताल में इंतजार करना पड़ा। म्हात्रे का दावा है कि महिला के परिवार की ओर से बार-बार फोन किए जाने के बाद वह अस्पताल पहुंचे थे। इसके बाद अस्पताल के कर्मचारियों के साथ विवाद हुआ।

7 जुलाई को इस मामले में प्राथमिकी दर्ज की गई, जिसमें म्हात्रे को आरोपी नंबर एक बनाया गया।

कल्याण के मजिस्ट्रेट ने 14 जुलाई को म्हात्रे को जमानत दी। अदालत ने उनकी उम्र, स्वास्थ्य संबंधी स्थिति, फरार होने की आशंका नहीं होने और मुख्य सीसीटीवी साक्ष्य पहले ही सुरक्षित किए जाने जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा था।

इसके बाद डॉक्टरों के विरोध-प्रदर्शन के बीच बॉम्बे हाईकोर्ट ने 18 जुलाई को घटना का स्वतः संज्ञान लिया और निचली अदालत द्वारा दी गई जमानत पर रोक लगाई। हाईकोर्ट ने म्हात्रे को आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। करीब दो सप्ताह बाद हाईकोर्ट ने उन्हें फिर जमानत दी, लेकिन कई कड़ी शर्तें लगा दीं।

इन शर्तों के तहत म्हात्रे को महाराष्ट्र से बाहर रहने और मुकदमा शुरू होने तक गोवा के कैलंगुट में रहने का निर्देश दिया गया। उन्हें सप्ताह में तीन बार अंजुना पुलिस थाने में हाजिरी लगाने को भी कहा गया।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में इन शर्तों के अलावा मामले की त्वरित सुनवाई, फोरेंसिक जांच, आरोपपत्र दाखिल करने और विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति से संबंधित हाईकोर्ट के निर्देशों को भी चुनौती दी गई।

सुप्रीम कोर्ट अब राज्य सरकार की ओर से प्रस्तावित जमानत रद्द करने की याचिका और म्हात्रे की चुनौती पर आगे सुनवाई करेगा।

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