सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि जो याचिकाकर्ता संवैधानिक पदों पर बैठे उन लोगों (जैसे जज) को सुविधाएं और लाभ दिए जाने को चुनौती दे रहा है, जो पद से हटाए जाने की कार्यवाही से बचने के लिए इस्तीफा दे देते हैं, उसकी बात में दम लगता है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ के सामने मेहता ने कहा,

"मैं निर्देश लेकर जवाब दूंगा। मुझे लगता है कि याचिकाकर्ता का पक्ष सही है। मैं इस पर अपना जवाब दाखिल करूंगा।"

अदालत ने मामले की सुनवाई टाल दी और केंद्र सरकार (यूनियन ऑफ इंडिया) को अपना जवाब (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने की अनुमति दी।

याचिका में मांग की गई कि संवैधानिक पदों पर बैठे उन लोगों को सुविधाएं, लाभ और अन्य अधिकार न दिए जाएं, जो पद से हटाए जाने की कार्यवाही से बचने के लिए इस्तीफा दे देते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही इस याचिका पर नोटिस जारी किया था।

याचिकाकर्ता चाहता है कि अदालत यह घोषित करे कि जो संवैधानिक पदाधिकारी पद से हटाए जाने की कार्यवाही से बचने के लिए इस्तीफा देते हैं, वे अपने पद से जुड़े लाभ पाने के हकदार नहीं होने चाहिए। याचिका में ऐसे किसी भी प्रावधान को भी चुनौती दी गई, जो इन पदाधिकारियों को पद से हटाए जाने से बचने के लिए कार्यकाल के बीच में इस्तीफा देने के बाद भी सुविधाएं और लाभ अपने पास रखने की अनुमति देता है। इसे अनुच्छेद 14 के तहत असंवैधानिक बताया गया।

याचिका में कहा गया कि एक उच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति पर यह एक अलिखित संवैधानिक जिम्मेदारी होती है कि वह अपना कार्यकाल पूरा करे, या फिर पद से हटाए जाने की पारदर्शी प्रक्रिया का सामना करे।

याचिकाकर्ता का तर्क है,

"पद से हटाए जाने से बचने के लिए इस्तीफा दे देना, कोई सही विकल्प नहीं है और न ही ऐसा होना चाहिए। इस तरह के इस्तीफे उस भरोसे को तोड़ते हैं जो संविधान ने इन उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों पर जताया है।"

याचिका में कहा गया कि इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों ने केवल इसलिए इस्तीफा दे दिया ताकि उन्हें पद से हटाए जाने की कार्यवाही का सामना न करना पड़े। तर्क यह है कि वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि इस्तीफा देने के बाद भी उन्हें वही सुविधाएं और लाभ मिलते रहेंगे, जो उन्हें अपना कार्यकाल पूरा करने पर मिलते।

अनुच्छेद 14 का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों और अन्य (गैर-संवैधानिक) पदों पर बैठे लोगों की स्थितियों में अंतर की ओर भी इशारा किया है। उन्होंने बताया कि जो लोग संवैधानिक पदों पर नहीं हैं, उन्हें विभागीय कार्यवाही (जिसमें उन्हें पद से हटाया जा सकता है) का सामना करने के दौरान इस्तीफा देने की अनुमति नहीं होती है।

इसमें यह तर्क दिया गया कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का दर्जा ऊंचा होना चाहिए। उन्हें सार्वजनिक जीवन में "ईमानदारी" दिखानी चाहिए—अपना कार्यकाल पूरा करके, और यदि जरूरत पड़े तो, देश के किसी भी अन्य कर्मचारी की तरह खुद को पद से हटाने की प्रक्रिया का सामना करके।

याचिका में कहा गया,

"ऐसे गैर-संवैधानिक कर्मचारियों और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के बीच कोई भी भेदभाव, एक तरह का पक्षपातपूर्ण भेदभाव है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।"

Case Title : Pratik Vira v. Union of India

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